सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!

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AMIR KHURSHEED MALIK
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Tuesday, August 4, 2015

बयानबाजियों में उलझती राजनीति

आज राजनीति कर्म से आगे बढ़ कर सिर्फ बयानबाजियों में उलझती नज़र आ रही है । अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग पक्षों की बयानबाजियाँ और राजनीतिक दलों की खींचतान के साथ ही माहौल में गर्माहट पैदा हो जाती है। शायद बयान देने वालों का मकसद भी यही हालात पैदा करना होता है । अक्सर ही ऐसे बेतुके बयान सामने आ जाते हैं । हालांकि ऐसे बयानों से सम्बंधित दल फ़ौरन ही किनारा कर लेता है । परन्तु मीडिया में चर्चा पा चूका बयान अपने उद्देश्य को पूरा कने में जुट जाता है किसी भी महानुभाव को संवैधानिक दायरे में ही सार्वजनिक बातचीत को रखना चाहिए। यकीनन यह हालात बदलने चाहिए । देश के संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को संविधान के दायरे में ही हल ढूंढना चाहिए । असंवैधानिक भाषा और असंसदीय आचरण से देश जुड़ता नहीं , बिखरता है । लोगों में उन्माद भरने से मसले सुलझते नहीं , उलझते हैं । 

Friday, February 27, 2015

भ्रूण हत्या - एक सामाजिक अपराध

भारत को अपनी अजन्मी बेटियों के भ्रूण हत्या के असामाजिक कृत्य को अपने सामाजिक दायरे से जुदा ना कर पाने का दंश लगातार बर्दाश्त करना पड रहा है। हर साल ऐसी 6 लाख बच्चियां जन्म नहीं ले पातीं जिन्हें देश के औसत लिंग अनुपात के हिसाब से दुनिया में आना था। देश में पुरूष-महिला लिंगानुपात के बीच की खाई लगातार बढ़ती ही जा रही है। विश्व स्तर पर हुए एक हालिया अध्ययन के मुताबिक आज हमारे देश में एक हजार पुरुष की तुलना में महिलाओं की संख्या 940 रह गई है। यह अंतर दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। लड़कियों की घटती संख्या और शिक्षा तथा रोज़गार के क्षेत्र में उनकी बढती सहभागिता के बावज़ूद हमारे सामाजिक ढांचे में लड़कियों और स्त्रियों की हैसियत में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आ पाया है । जिस देश में नारी रूप में अनेक देवीयों की पूजा अर्चना की जाती है। उस देश में बेटीयों को अपने अस्तित्व के लिए संर्घष करना पङ रहा है। बेटा वंश परंपरा को आगे बढ़ाता है, बेटा मां-बाप के साथ रहकर बुढ़ापे का सहारा बनता है ,जैसी दलीलें पुरुष प्रधान समाज ने विकसित की । वही सामाजिक ताने बाने ने लड़कियों के लिए भरण पोषण, दहेज़ के साथ साथ शारीरिक सुरक्षा की भी चिंता पैदा कर दी । इन्ही सब के मध्य बालक-बालिका के बीच पनपता भेदभाव लोगों के मन से निकल कर आंकड़ों के भयावाह स्वरुप में हमारे सामने आ खड़ा हुआ है । 

Sunday, February 22, 2015

बलात्कार के अन्य कारक

Amir Khursheed Malik
एक आंकलन के अनुसार बलात्कार की घटनाओं में से 60 से 65 फीसदी खुले में शौच गयीं महिलाओं के साथ होती है। यूपी पुलिस के अनुसार उनके पास आने वाले मामलों में ६० फीसदी से अधिक ऐसे ही मामले होते है । एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट भी कुछ इसी तरह का निष्कर्ष देती है । विश्व स्वास्थ्य संगठन की अगर मानें तो  भारत में आज भी साठ करोड़ लोग खुले में शौच जाते हैं, जिसमें आधी संख्या महिलाओं की है। भारत में खुले में शौच की प्रवृत्ति को रोकने और घर के ही कोने में शौचालय बनवाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए 1999 से ही निर्मल भारत अभियानचलाया जा रहा है। परन्तु अभी तक इस योजना के लाभ को आंकना बाकी है । सरकारी दावे तो बहुत हुए , परन्तु वास्तविकता इस से कहीं अलग प्रतीत होती है । . केंद्र सरकार का दावा है कि देश की 43 फीसदी आबादी ही शौचालय से वंचित है, पर एक एन.जी.ओ. से जुड़े व्यक्ति का कहना है कि देश की सिर्फ 30 फीसदी आबादी को ही शौचालय सुलभ हो सका है।

Thursday, January 15, 2015

यू टर्न

मुझे अच्छी तरह पता है कि राजनीति अच्छी चीज़ नहीं है ! भ्रष्टाचार के विरुद्ध सशक्त आवाज़ इससे अलग रह कर ही उठाई जा सकती है ! चूँकि मेरी प्राथमिकता, ............मेरी लड़ाई भ्रष्टाचार के विरुद्ध है इसलिए मै इसमें कभी शामिल नहीं हूँगा ...................................... लेकिन
...............................लेकिन
.....................लेकिन
.............लेकिन
...लेकिन
अगर दिल्ली के मुख्यमंत्री का पद मिले , तो इरादा बदल भी सकता है

Thursday, December 25, 2014

““यू टर्न”

मोदी सरकार 6 महीने गुजरने के साथ ही “यू टर्न” सरकार का तमगा हासिल करने में कामयाब रही है। बीमा विधेयक हो या बांग्लादेश के साथ सीमा समझौता , एफडीआई में विदेशी निवेश बढाने की नीति हो या नेताजी सुभाषचंद्र बोस की फाइलों के सच को छुपाने की चाहत । आज भाजपा की सरकार वही कर रही है जो संप्रग सरकार करना चाहती थी । कालाधन , एफडीआई , पाक का मुंहतोड़ जवाब ,जैसे कई मुद्दों पर बीजेपी का रुख बदला हुआ नज़र आरहा है । यह कहना गलत ना होगा कि आज भाजपा सरकार अपने परंपरागत वादों से मुकरती नज़र आ रही है उधर अगर दुसरे पहलू पर देखें तो आज कई मुद्दों पर कांग्रेस की वही राय है ,जो विपक्ष में रहते हुए भाजपा बोलती थी । हालाँकि सरकार का दावा है कि उसने छह महीने में बहुत कुछ कर दिया है । भाजपा को एक के बाद एक चुनावी कामयाबी भी मिल रही है, लेकिन हर चुनावी कामयाबी के बाद उम्मीदों की संख्या भी बढती जा रही है। सिर्फ 6 माह में हर उम्मीद तो परवान नही चढ़ सकती पर ऐसे में बीजेपी के पुराने वायदों पर सबकी नज़र जाना स्वभाविक है ।

Tuesday, December 2, 2014

सामाजिक बेशर्मी बनाम प्रशासनिक शिथिलता


एनसीआरबी के 1953 से लेकर 2011 तक के अपराध के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 1971 के बाद से देश में बलात्कार की घटनाएं 873.3 फीसदी तक बढ़ी हैं। इसके अलावा उन मामलों की फेरहिस्त भी काफी लंबी है जिनकी शिकायत थाने तक पहुंची ही नहीं या पहुंचने ही नहीं दी गई। बलात्कार के अधिकतर मामलों में महिला का कोई करीबी या जानकार बलात्कार के मामले में शामिल होता है । जिससे घटना को होने से पहले रोक पाने में पुलिस की भूमिका कम प्रभावी हो पाती है । लेकिन अगर त्वरित कार्यवाही और सजा के उदाहरण सामने हों । तो घटनाओं पर लगाम लग सकती है । दुखदाई पहलु यह है कि पीडिता को ही समाज भी तिरस्कार देता है । जिससे आरोपियों के होसले बुलंद होते हैं । कोई घटना होने पर सामाजिक संघटनो का प्रतिरोध सड़कों पर नज़र आता है ।उस वक़्त कार्यवाही के लम्बे चौड़े वायदे होते हैं । तत्पश्चात व्यवस्था फिर उसी ढर्रे पर सवार नज़र आती है । क्या हमें बार-बार बलात्कार की घटना हो जाने के बाद प्रतिवावद और आंदोलन की जरूरत है ? आखिर क्यों नहीं एक सशक्त कानून और उसका पालन करता तंत्र सामने आता ? आखिर क्यों नहीं हमारा समाज पीडिता के पक्ष में , और आरोपी के विरोध में मजबूती के साथ नज़र आता है ?  सामाजिक बेशर्मी और प्रशासनिक शिथिलता के कारण इसके उत्तर लापता हैं।