एनसीआरबी के 1953 से लेकर 2011 तक के अपराध के
आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 1971
के बाद से देश में बलात्कार की घटनाएं 873.3 फीसदी तक बढ़ी हैं। इसके अलावा उन मामलों की
फेरहिस्त भी काफी लंबी है जिनकी शिकायत थाने तक पहुंची ही नहीं या पहुंचने ही नहीं
दी गई। बलात्कार के अधिकतर
मामलों में महिला का कोई करीबी या जानकार बलात्कार के मामले में शामिल होता है ।
जिससे घटना को होने से पहले रोक पाने में पुलिस की भूमिका कम प्रभावी हो पाती है ।
लेकिन अगर त्वरित कार्यवाही और सजा के उदाहरण सामने हों । तो घटनाओं पर लगाम लग
सकती है । दुखदाई पहलु यह है कि पीडिता को ही समाज भी तिरस्कार देता है । जिससे
आरोपियों के होसले बुलंद होते हैं । कोई घटना होने पर सामाजिक संघटनो का प्रतिरोध
सड़कों पर नज़र आता है ।उस वक़्त कार्यवाही के लम्बे चौड़े वायदे होते हैं । तत्पश्चात
व्यवस्था फिर उसी ढर्रे पर सवार नज़र आती है । क्या हमें बार-बार बलात्कार की
घटना हो जाने के बाद प्रतिवावद और आंदोलन की जरूरत है ? आखिर क्यों नहीं
एक सशक्त कानून और उसका पालन करता तंत्र सामने आता ? आखिर क्यों नहीं
हमारा समाज पीडिता के पक्ष में , और आरोपी के विरोध में मजबूती के साथ नज़र आता
है ? सामाजिक बेशर्मी और
प्रशासनिक शिथिलता के कारण इसके उत्तर लापता हैं।

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