सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!

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AMIR KHURSHEED MALIK
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Friday, January 15, 2016

धर्म के स्वघोषित झंडाबरदार

ना चाहते हुए भी आज एक सवाल पूछने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ । क्या धर्म की आड़ में हमको कानून तोड़ने की गुप-चुप इज़ाज़त हासिल है ? सवाल अटपटा जरुर लगता है , लेकिन अगर नज़र दौडाएं तो हमको इसमें कडवी सच्चाई नज़र आती है ।धार्मिक जुलूसों में दौड़ते दुपहिया वाहनों पर तीन से लेकर चार तक तो समाने की कोशिश हो, या फिर सड़क पर रास्ता बंद करके होते धार्मिक आयोजन हों , कानून की खिल्ली सरेआम कानून के रखवालों के सामने ही उडती नज़र आती है। इसके साथ ही इन तथाकथित धार्मिकों के चेहरे पर पुलिसिया डंडे को परास्त कर देने का एक अनूठा दंभ भी अक्सर ही नज़र आता है । कई बार यह उन्मादित आचरण दुर्घटनाओं का कारण भी बनते है ।
अवैध क़ब्ज़ा करके दिन ब दिन पनपते आस्था के केन्द्रों की बढती संख्या भी उन परम धार्मिक चेहरों के लिए सवाल ही खड़ा करती हैं । यह लोग धर्म के नाम पर अपनी जान देने का तो दावा कर जाते हैं , पर अपनी आस्था के केंद्र के लिए अपनी निज़ी जगह दान करने को तैयार नहीं होते । शायद हम सबने मान लिया है कि इसके लिए सरकारी जगह पर क़ब्ज़ा ही न्यायोचित तरीका है उदाहरण ढेरों हैं , लेकिन यहाँ पर सिर्फ मूल भावना तक पहुँचने के लिए इन उदाहरणों का ज़िक्र किया गया है ।
अगर बात घर्म की चलती है तो यह मान के चला जाता है कि यह हम सबको सही रास्ते पर चलने की राह दिखाएगा । ऐसे में जब उसकी ही आड़ में बेशर्मी के साथ कानून का उल्लंघन होता नज़र आता है । तब यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि, क्या धर्म कानून के कायदे से अलग किसी प्रथा का समर्थन करता है ? या फिर

धर्म के स्वघोषित झंडाबरदार ही इस परिस्थिति के ज़िम्मेदार हैं ?

Tuesday, August 4, 2015

बयानबाजियों में उलझती राजनीति

आज राजनीति कर्म से आगे बढ़ कर सिर्फ बयानबाजियों में उलझती नज़र आ रही है । अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग पक्षों की बयानबाजियाँ और राजनीतिक दलों की खींचतान के साथ ही माहौल में गर्माहट पैदा हो जाती है। शायद बयान देने वालों का मकसद भी यही हालात पैदा करना होता है । अक्सर ही ऐसे बेतुके बयान सामने आ जाते हैं । हालांकि ऐसे बयानों से सम्बंधित दल फ़ौरन ही किनारा कर लेता है । परन्तु मीडिया में चर्चा पा चूका बयान अपने उद्देश्य को पूरा कने में जुट जाता है किसी भी महानुभाव को संवैधानिक दायरे में ही सार्वजनिक बातचीत को रखना चाहिए। यकीनन यह हालात बदलने चाहिए । देश के संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को संविधान के दायरे में ही हल ढूंढना चाहिए । असंवैधानिक भाषा और असंसदीय आचरण से देश जुड़ता नहीं , बिखरता है । लोगों में उन्माद भरने से मसले सुलझते नहीं , उलझते हैं । 

Sunday, November 16, 2014

अमन की बात

अमन की बात करना बेहतर रास्ता है ! फिर भी अलगाव की कोशिशों को सोशल मीडिया पर हवा देने का काम कुछ लोग कर रहे हैं ! इस समाज के लिए , इस देश के लिए , और इंसानियत के लिए हमारी कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं ! जो हम को निभाना ही चाहिए ! मगर कुछ लोग सच्ची – झूठी बातों को नमक मिर्च लगा कर हवा देते हैं ! हमारी प्रतिबद्धता किसी भी धर्म के लिए हो सकती है ! धार्मिक होना अच्छी बात है ! पर धर्म के अधूरे ज्ञान की पोटली लिए यह लोग धर्म के मूल भाव इंसानियत को भूल जाते हैं ! 
अपराध , सिर्फ अपराध होता है ! इसको धार्मिक पहचान नही दी जा सकती ! दोषी को सजा मिलनी ही चाहिए ! पर दोषी को सजा मिल पाए उससे पहले ही कई निर्दोष दंगों की बलि चढ़ जाएँ ! यह कहाँ की समझदारी है ? अगर हम सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं , अगर हम लिख सकते हैं , तो हमारी कोशिश कुछ अच्छा करने की क्यों नहीं होती ? हम अमन के पैरोकार बन कर क्यों नहीं उबरते ? दुःख देने के बजाय सुख देने का एहसास हासिल कर के क्यों नहीं देख लेते ? जोड़ने का सुख , तोड़ने के दुःख से कहीं बेहतर एहसास होता है !

Thursday, February 20, 2014

मै ही साम्प्रदायिकता हूँ

मै ही साम्प्रदायिकता हूँ
छल-प्रपंचो से रची गई
झूठे आडम्बरों से ढकी गई
कपट के आँचल में ही पली
विष का ही जय गान किया
क्योंकि ...... मै ही साम्प्रदायिकता हूँ !
दोषी का ही गुण-गान किया
आरोपी को ही सम्मान दिया
निश्चल-निर्मल धाराओं का
सदा ही यूँ अपमान किया
 क्योंकि ...... मै ही साम्प्रदायिकता हूँ !
राजनीति का रूप बदलकर
कुनीति का जयगान किया
सत्ता के गलियारों में भी
नंगो जैसा नाच किया
क्योंकि ...... मै ही साम्प्रदायिकता हूँ !
निर्दोषों का रक्त बहा कर
मानवता का अपमान किया
पाखंडों के साए में हरदम
धर्म का ही अपमान किया
क्योंकि ...... मै ही साम्प्रदायिकता हूँ !