ना चाहते हुए भी आज एक सवाल पूछने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ । क्या धर्म की आड़ में हमको कानून तोड़ने की गुप-चुप इज़ाज़त हासिल है ? सवाल अटपटा जरुर लगता है , लेकिन अगर नज़र दौडाएं तो हमको इसमें कडवी सच्चाई नज़र आती है ।धार्मिक जुलूसों में दौड़ते दुपहिया वाहनों पर तीन से लेकर चार तक तो समाने की कोशिश हो, या फिर सड़क पर रास्ता बंद करके होते धार्मिक आयोजन हों , कानून की खिल्ली सरेआम कानून के रखवालों के सामने ही उडती नज़र आती है। इसके साथ ही इन तथाकथित धार्मिकों के चेहरे पर पुलिसिया डंडे को परास्त कर देने का एक अनूठा दंभ भी अक्सर ही नज़र आता है । कई बार यह उन्मादित आचरण दुर्घटनाओं का कारण भी बनते है ।
अवैध क़ब्ज़ा करके दिन ब दिन पनपते आस्था के केन्द्रों की बढती संख्या भी उन परम धार्मिक चेहरों के लिए सवाल ही खड़ा करती हैं । यह लोग धर्म के नाम पर अपनी जान देने का तो दावा कर जाते हैं , पर अपनी आस्था के केंद्र के लिए अपनी निज़ी जगह दान करने को तैयार नहीं होते । शायद हम सबने मान लिया है कि इसके लिए सरकारी जगह पर क़ब्ज़ा ही न्यायोचित तरीका है उदाहरण ढेरों हैं , लेकिन यहाँ पर सिर्फ मूल भावना तक पहुँचने के लिए इन उदाहरणों का ज़िक्र किया गया है ।
अगर बात घर्म की चलती है तो यह मान के चला जाता है कि यह हम सबको सही रास्ते पर चलने की राह दिखाएगा । ऐसे में जब उसकी ही आड़ में बेशर्मी के साथ कानून का उल्लंघन होता नज़र आता है । तब यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि, क्या धर्म कानून के कायदे से अलग किसी प्रथा का समर्थन करता है ? या फिर
धर्म के स्वघोषित झंडाबरदार ही इस परिस्थिति के ज़िम्मेदार हैं ?
अवैध क़ब्ज़ा करके दिन ब दिन पनपते आस्था के केन्द्रों की बढती संख्या भी उन परम धार्मिक चेहरों के लिए सवाल ही खड़ा करती हैं । यह लोग धर्म के नाम पर अपनी जान देने का तो दावा कर जाते हैं , पर अपनी आस्था के केंद्र के लिए अपनी निज़ी जगह दान करने को तैयार नहीं होते । शायद हम सबने मान लिया है कि इसके लिए सरकारी जगह पर क़ब्ज़ा ही न्यायोचित तरीका है उदाहरण ढेरों हैं , लेकिन यहाँ पर सिर्फ मूल भावना तक पहुँचने के लिए इन उदाहरणों का ज़िक्र किया गया है ।
अगर बात घर्म की चलती है तो यह मान के चला जाता है कि यह हम सबको सही रास्ते पर चलने की राह दिखाएगा । ऐसे में जब उसकी ही आड़ में बेशर्मी के साथ कानून का उल्लंघन होता नज़र आता है । तब यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि, क्या धर्म कानून के कायदे से अलग किसी प्रथा का समर्थन करता है ? या फिर
धर्म के स्वघोषित झंडाबरदार ही इस परिस्थिति के ज़िम्मेदार हैं ?

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