आज राजनीति कर्म से आगे बढ़ कर सिर्फ बयानबाजियों में उलझती
नज़र आ रही है । अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग पक्षों की
बयानबाजियाँ और राजनीतिक दलों की खींचतान के साथ ही माहौल में गर्माहट पैदा हो जाती
है। शायद बयान देने वालों का मकसद भी यही हालात पैदा करना होता है । अक्सर ही ऐसे बेतुके
बयान सामने आ जाते हैं । हालांकि ऐसे बयानों से सम्बंधित दल फ़ौरन ही किनारा कर लेता
है । परन्तु मीडिया में चर्चा पा चूका बयान अपने उद्देश्य को पूरा कने में जुट
जाता है । किसी भी महानुभाव को संवैधानिक दायरे में ही सार्वजनिक
बातचीत को रखना चाहिए। यकीनन यह हालात बदलने चाहिए ।
देश के संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को संविधान के दायरे में ही हल ढूंढना चाहिए ।
असंवैधानिक भाषा और असंसदीय आचरण से देश जुड़ता नहीं , बिखरता है । लोगों में
उन्माद भरने से मसले सुलझते नहीं , उलझते हैं ।
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