सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!

सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!
AMIR KHURSHEED MALIK

Thursday, February 20, 2014

नीरो बांसुरी बजाता रहा !

नीरो बांसुरी बजाता रहा !
रोम जल रहा था , पर नीरो बांसुरी बजाता रहा मुज़फ्फरनगर के राहत शिविरों में बदहाली, ठण्ड से बढती मौतों के बीच सैफई मे रास-रंग की महफ़िल चलती रही आधुनिक नीरो भी अपने में मस्त महोत्सव का आनंद लेते रहे मुसलमानों के खैरख्वाह बनने का दावा करने वाले आज़म खान अपनी पलटन के साथ विदेश यात्रा का लुत्फ़ लेते रहे लोगों की चीत्कार इन लोगों के कानों में नहीं पहुंची , या जान बूझ कर अनसुनी कर कर दी गई महफ़िल की रौनक़ बढ़ाने में सरकारी अमले ने कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन यह मुस्तैदी मुज़फ्फरनगर मैं नदारद रही कंपकपाने वाली ठण्ड में अस्थाई ठिकाना छीनने की कोशिश भी लगातार जारी है कई जगह सरकारी कारिंदों ने ज़ुल्म ढाए , जहाँ नहीं कर पाए वहां इन ज़ुल्म के शिकार लोगों पर ही सरकारी संपत्ति पर ज़बरन कब्जे की कहानी बना डाली संस्कृति विभाग ने करोडो रूपए बर्बाद कर डाले लोहियावाद का आधुनिकीकरण करने की इन सरकारी कोशिशों को हिकारत की नज़र से समाज ने देखा जरुर ! पर दुर्दिन का शिकार लोगों के हालात पर भी इस सहानुभूति का कोई क़तरा नहीं पहुंचा
आखिर यह हालात किस बात की तरफ इशारा कर रहे हैं ? क्या सपा सरकार यह मान चुकी है कि इन दंगा राहत शिविरों में सिर्फ भाजपाई और कांग्रेसी ही रह रहे हैं ? और इन राजनीतिक दुश्मनों के लिए उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती इस हास्यास्पद हालात पर रोना आता है राजधर्म की दुहाई गुजरात सरकार को बार-बार याद दिलाने वालों को खुद राजधर्म की परिभाषा याद नहीं रही उत्तर प्रदेश की सपा सरकार के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सर्वेसर्वा मुलायम सिंह यादव के बयान भी पीडितो के ज़ख्म पर नमक छिड़कने वाले ही आये अफ़सोस बयानबाज़ी के माहिर ये जांबाज़ ज़बानी मरहम लगाने में भी चुक गए
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा का सत्ता का रास्ता मुस्लिम वोटों के दरमियान से ही जाता है ऐसे में मुज़फ्फरनगर में दंगा पीड़ितों के साथ किया गया अबूझ रवैय्या मुलायम सिंह की राजनीतिक समझदारी पर भी सवाल खड़े कर रहा है राहत को दरकिनार कर दंगे के दोषी मुस्लिम नेताओं पर मामला वापस लेने की पहल ने उनकी बाकी बची साख भी मिटटी में मिला दी दंगा पीड़ितों को न्याय तो मिला नहीं , उलटे सामान्य होते दोनों समुदायों के बीच दूरियां फिर बढ़ गईं दोषी तो सिर्फ दोषी होता है ! उसको न्यायिक प्रक्रिया से ही निपटा जा सकता है धार्मिक आधार पर दोषमुक्त करना समझ के परे है , और न्यायसंगत भी नहीं है आज जब की पुरे देश में नई तरह की राजनीतिक लहर की सिहरन सौ साल पुरानी पार्टी को भी पछाड़ चुकी है , ऐसे में इस तरह की सामंतवादी राजनीति कितना परवान चढ़ेगी , निःसंदेह सवालों के घेरे में है ?


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