नीरो बांसुरी बजाता रहा !
रोम जल रहा था , पर नीरो बांसुरी बजाता रहा । मुज़फ्फरनगर के राहत शिविरों में बदहाली, ठण्ड से बढती मौतों के बीच सैफई मे रास-रंग की महफ़िल चलती रही । आधुनिक नीरो भी अपने में मस्त महोत्सव का आनंद
लेते रहे । मुसलमानों के खैरख्वाह बनने का दावा करने वाले आज़म खान अपनी पलटन के साथ विदेश
यात्रा का लुत्फ़ लेते रहे । लोगों की चीत्कार इन लोगों के कानों में नहीं पहुंची , या जान बूझ कर अनसुनी कर कर दी गई । महफ़िल की रौनक़ बढ़ाने में सरकारी अमले ने कोई कसर
नहीं छोड़ी । लेकिन यह मुस्तैदी मुज़फ्फरनगर मैं नदारद रही । कंपकपाने वाली
ठण्ड में अस्थाई ठिकाना छीनने की कोशिश भी लगातार जारी है । कई जगह सरकारी
कारिंदों ने ज़ुल्म ढाए , जहाँ नहीं कर पाए वहां इन ज़ुल्म के शिकार लोगों पर ही सरकारी संपत्ति पर ज़बरन
कब्जे की कहानी बना डाली । संस्कृति विभाग ने करोडो रूपए बर्बाद कर डाले । लोहियावाद का आधुनिकीकरण करने की इन सरकारी
कोशिशों को हिकारत की नज़र से समाज ने देखा जरुर ! पर दुर्दिन का शिकार लोगों के हालात पर भी इस
सहानुभूति का कोई क़तरा नहीं पहुंचा ।
आखिर यह हालात किस बात की तरफ इशारा कर रहे हैं ? क्या सपा सरकार यह मान चुकी है कि इन दंगा
राहत शिविरों में सिर्फ भाजपाई और कांग्रेसी ही रह रहे हैं ? और इन राजनीतिक दुश्मनों के लिए उसकी कोई
ज़िम्मेदारी नहीं बनती । इस हास्यास्पद हालात पर रोना आता है । राजधर्म की
दुहाई गुजरात सरकार को बार-बार याद दिलाने वालों को खुद राजधर्म की परिभाषा याद नहीं
रही । उत्तर प्रदेश की
सपा सरकार के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और सर्वेसर्वा मुलायम सिंह यादव के बयान भी
पीडितो के ज़ख्म पर नमक छिड़कने वाले ही आये । अफ़सोस बयानबाज़ी के माहिर ये जांबाज़ ज़बानी मरहम
लगाने में भी चुक गए ।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा का सत्ता का रास्ता
मुस्लिम वोटों के दरमियान से ही जाता है । ऐसे में मुज़फ्फरनगर में
दंगा पीड़ितों के साथ किया गया अबूझ रवैय्या मुलायम सिंह की राजनीतिक समझदारी पर भी
सवाल खड़े कर रहा है । राहत को दरकिनार कर दंगे के दोषी मुस्लिम नेताओं पर मामला वापस लेने की पहल ने
उनकी बाकी बची साख भी मिटटी में मिला दी । दंगा पीड़ितों को न्याय
तो मिला नहीं , उलटे सामान्य होते दोनों समुदायों के बीच दूरियां फिर बढ़ गईं । दोषी तो सिर्फ
दोषी होता है ! उसको न्यायिक प्रक्रिया से ही निपटा जा सकता है । धार्मिक आधार पर
दोषमुक्त करना समझ के परे है , और न्यायसंगत भी नहीं है । आज जब की पुरे
देश में नई तरह की राजनीतिक लहर की सिहरन सौ साल पुरानी पार्टी को भी पछाड़ चुकी है
, ऐसे में इस तरह की सामंतवादी राजनीति कितना
परवान चढ़ेगी , निःसंदेह सवालों के घेरे में है ?
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