सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!

सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!
AMIR KHURSHEED MALIK

Monday, November 24, 2014

दक्षिण भारतीय फिल्मों का अनोखा खलनायक : अदीब नज़ीर

अदीब नज़ीर , दक्षिण भारतीय फिल्मों और रंग मंच का वो नाम है जिसका जूनून और समर्पण , उसको औरों से अलग कर देता है ! अपनी स्थापित दिनचर्या को ठुकरा कर अपने सपने को पूरा करने को आगे बढे अदीब नाज़िर का जन्म दक्षिण भारत के वारंगल (तेलांगना राज्य) में हुआ था ! यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस के डिवीज़नल मैनेजर के पद को समय से पहले अलविदा कहके रंगमंच और फिल्मों के लिए पूरा समय देने के फैसले के बाद अदीब नाज़िर का हुनर पूरे निखार पर आ गया !
लगभग 15 तेलगु फिल्मों में खलनायक का रोल करने वाले अदीब नज़ीर   असल ज़िन्दगी में बहुत अच्छे इंसान हैं ! वर्तमान में हैदराबाद के निवासी अदीब की पहली हिंदी फिल्म प्यासी नागिन(1994) थी ! फिल्मों की चमक भरी दुनिया के बाद भी रंगमंच के लिए उनकी प्राथमिकतायें सर्वोपरि रहती हैं ! सामाजिक मुद्दों पर लगातार सांस्कृतिक कार्यक्रम उनकी प्राथमिकता रहती है ! स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के  सम्मान से जुड़े मुद्दे हों , या फिर भूख से बिलखते किसान ! दहेज़ हत्या के विरुद्ध अलख जगाने का मुहिम हो , या फिर देश की सीमा पर शहीद हुए वीरों के परिवार के सहायतार्थ फ़िल्मी सितारों का कोई आयोजन , अदीब नज़ीर हर जगह पूरी तन्मयता से लगे रहते हैं !

अपनी पहली तेलगु फिल्म Mantrala Marri Chettu में मुख्य खलनायक की भूमिका निभाने वाले अदीब समाज में बिखराव को लेकर चिंतित हैं ! अपने 20 वर्ष के फ़िल्मी अनुभव को लेकर अब उन्होंने अपनी कहानी को लेकर निर्देशन करने की ठानी है !

परिंदा आर्ट्स इन्टरनेशनल फिल्म्स के बैनर तले उनकी अगली तेलगु फिल्म Prema Gelupu Kosame Ghani. ..Gaadse Kaadu की तैय्यारी जोर-शोर से चल रही है ! इस फिल्म में सामाजिक ताने बाने में अलगाव का दंश झेल रहे लोगो के लिए एक अच्छा सन्देश है ! अदीब अपनी फिल्म को औरतों पर हो रहे जुर्म के खिलाफ भी हथियार बनाना चाहते हैं ! लेकिन उनकी चिंता साम्प्रदायिकता को लेकर आ रहे अलगाव को लेकर भी कम नहीं है ! वो अपनी फिल्म को “हम सब एक हैं” का सन्देश देने के लिए सामने लाना चाहते हैं ! उनके साथ इस फिल्म में नमिता , शफी , बैनर्जी , जीवा , ब्रह्मानंद , सुनील,नरेंद्र,पुविषा,हरिका,लक्ष्मन,चिनी,और रवि आदि भूमिका निभा रहे हैं !
(आमिर खुर्शीद मलिक) 

Saturday, November 22, 2014

शाहजहांपुर रंगकर्म की नीव : चंद्रमोहन महेन्द्रू

शाहजहांपुर की रंगयात्रा की नींव के पत्थरों में से एक उल्लेखनीय नाम चंद्रमोहन महेन्द्रू का है ! जनपद में रामलीला के नायाब मंचन हों , या फिर पारसी रंगमंच से प्रभावित ऐतिहासिक नाटकों का दौर ! आधुनिक रंगमंच के तकनीकी पक्षों से सजे-संवरे सामाजिक नाटको का मंचन हो , या फिर राष्ट्रीय स्तर पर शाहजहांपुर के समर्द्ध रंगमंच की पताका फहराने की बात हो , चंद्रमोहन “महेन्द्रू” का नाम हर जगह ऊँचाइयों पर रहा !

चंद्रमोहन “महेन्द्रू” का जन्म 19 नवम्बर 1944 को पाकिस्तान में एक पंजाबी क्षत्रिय परिवार में हुआ ! उनका परिवार बंटवारे के बाद देहरादून,लुधियाना होता हुआ 1955 में शाहजहांपुर आ गया ! चंद्रमोहन “महेन्द्रू” को रंगकर्म विरासत में मिला था ! उनके पिता स्वर्गीय चमन लाल “महेन्द्रू” एक अच्छे रंगकर्मी और गायक थे ! उनसे मिली प्रेरणा और प्रोत्साहन की बदौलत चंद्रमोहन “महेन्द्रू” का रुझान धीरे-धीरे रंगकर्म की ओर बढ़ता चला गया ! आर्थिक झंझावातों नें उनकी राह रोकी , पर उनका यह जूनून समय के साथ बढ़ता चला गया ! अपनी पढाई के दौरान ही उन्हें “सिकंदर और पोरस” नाटक में अभिनय का मौका मिला ! यह उनके रंगमंच का पहला पडाव था ! 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान ऑर्डिनेंस क्लोदींग फैक्ट्री में भर्ती होने का मौका मिला , जिससे परिवार के हालात सुधारने के साथ-साथ रंगमंच से प्रभावी तरीके से जुड़ने का मौका भी जय नाट्यम संस्था के मार्फ़त उन्हें मिल गया !

इसी दौरान शाहजहांपुर में नाटको की सफलता से उत्साहित होकर “ऑर्डिनेंस ड्रामेटिक क्लब” का गठन किया गया  ! जिसमें चंद्रमोहन “महेन्द्रू” को अपनी प्रतिभा दिखने का मौका मिला ! 1971 में चंद्रमोहन “महेन्द्रू” को “ऑर्डिनेंस ड्रामेटिक क्लब” की रामलीला में प्रवेश मिल गया ! उन्होंने रामलीला में रावण,परशुराम,दशरथ जैसी चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं उन्होंने निभाई ! इस बीच उनका जुडाव जय नाट्यम संस्था से बना रहा ! इसी दौरान शाहजहांपुर के रंगमंच में क्रांतिकारी बदलाव आया ! आधुनिक रंगमंच ने शाहजहांपुर में दस्तक दी ! साहित्यिक संस्था “अनामिका” नें नाट्य क्षेत्र में पदार्पण किया ! भोपाल के नाट्य निर्देशक कमल वशिष्ठ ने आधुनिक रंगमंच की बारीकियों को एक वर्कशॉप के द्वारा समझाया ! तत्पश्चात असग़र वजाहत के नाटक “इन्ना की आवाज” का मंचन भी किया गया ! इस मंचन में चंद्रमोहन “महेन्द्रू” की प्रतिभा का बेहतरीन पक्ष सामने उभर कर आया  ! इसी दौरान चेखव की कहानी “गिरगिट” का भी मंचन किया गया ! 1984 में आयोजित एक और वर्कशॉप में अमरेन्द्र सहाय अमर ने नाटक “कोणार्क” को तैयार कराया , जिसकी केन्द्रीय भूमिका के लिए चंद्रमोहन “महेन्द्रू” को चुना गया ! उन्होंने अपने पात्र के साथ पूरा न्याय किया ! इस नाटक के बाद में कई मंचन भी हुए ! 1985 में “एक था गधा उर्फ़ अलादाद खान” में भी उनकी भूमिका प्रशंसा का विषय बनी !


1986 में बनी “कोरोनेशन” के संस्थापक ज़रीफ़ मलिक आनंद नें अपनी पहली प्रस्तुति “प्रमोशन” के निर्देशन का दायित्व चंद्रमोहन “महेन्द्रू” को ही सौंपा ! निर्देशन से जुड़ने के बाद उन्होंने “जनता पागल हो गई है”, “छत पुरानी” , “सिंहासन खाली है” आदि कई प्रमुख प्रस्तुतियों को निर्देशन से सवारा !उन्होंने टेलीफिल्म “सलाह”में भी काम किया ! 1989 में संस्कृति पर फासीवादी हमले के विरुद्ध हुए प्रदर्शनों में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही !

शाहजहांपुर में नुक्कड़ नाटक को लाने और निर्देशन का सौभाग्य चंद्रमोहन “महेन्द्रू” को ही मिला ! 1989 में जसम के बैनर तले “जागो-जागो” के तीन मंचन एक उदाहरण बन गए !राजेश कुमार लिखित नुक्कड़ नाटक “हमें बोलने दो” ,महेश सक्सेना द्वारा लिखित नाटक “दिशा” ,सर्वेश्वर दयाल शर्मा रचित “बकरी”, में उन्होंने निर्देशन किया ! “बकरी” को अखिल भारतीय नाटक प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी मिला ! राजेश कुमार के साथ उन्होंने “आखिरी सलाम” का संयुक्त निर्देशन किया !प्रेमचंद की “पूस की रात” के  अपने निर्देशन में रौनक अली के अभिनय से संवरे 50 शो कराये , जोकि अपने आप में एक कीर्तिमान बन गया ! 2005 में भुवनेश्वर के नाटक “सिकंदर” का निर्देशन,चंद्रमोहन दिनेश की कहानी “एक दा विकास खंडे” का नाट्य रूपांतरण और निर्देशन ,मीरा कान्त के नाटक “भुवनेश्वर दर भुवनेश्वर” का निर्देशन उनकी विशिष्ठ उपलब्धि रही ! इसके अलावा भी ढेरों नाटकों और प्रस्तुतियों में वह भागीदार रहे हैं ! 
 चंद्रमोहन
“महेन्द्रू” को 1998 में जनपद रत्न से सम्मानित किया गया !इसके अतिरिक्त उन्हें परिक्रमा,संकल्प,गांधी पुस्तकालय, ऑर्डिनेंस ड्रामेटिक क्लब,संस्कृति एकता मंच,द्वारा भी सम्मानित किया गया ! उनको गांगुली स्मृति सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला ! राष्ट्रीय साहित्य कला संस्थान द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया गया ! मशहूर फ़िल्मी कलाकार राजपाल यादव ने भी उनके नाटक में काम किया है !चंद्रमोहन “महेन्द्रू” की रंग यात्रा को कुछ शब्दों में समेटना मुश्किल है !  शाहजहांपुर का रंगकर्म उनके बहुमूल्य योगदान का गवाह है !

Sunday, November 16, 2014

अमन की बात

अमन की बात करना बेहतर रास्ता है ! फिर भी अलगाव की कोशिशों को सोशल मीडिया पर हवा देने का काम कुछ लोग कर रहे हैं ! इस समाज के लिए , इस देश के लिए , और इंसानियत के लिए हमारी कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं ! जो हम को निभाना ही चाहिए ! मगर कुछ लोग सच्ची – झूठी बातों को नमक मिर्च लगा कर हवा देते हैं ! हमारी प्रतिबद्धता किसी भी धर्म के लिए हो सकती है ! धार्मिक होना अच्छी बात है ! पर धर्म के अधूरे ज्ञान की पोटली लिए यह लोग धर्म के मूल भाव इंसानियत को भूल जाते हैं ! 
अपराध , सिर्फ अपराध होता है ! इसको धार्मिक पहचान नही दी जा सकती ! दोषी को सजा मिलनी ही चाहिए ! पर दोषी को सजा मिल पाए उससे पहले ही कई निर्दोष दंगों की बलि चढ़ जाएँ ! यह कहाँ की समझदारी है ? अगर हम सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं , अगर हम लिख सकते हैं , तो हमारी कोशिश कुछ अच्छा करने की क्यों नहीं होती ? हम अमन के पैरोकार बन कर क्यों नहीं उबरते ? दुःख देने के बजाय सुख देने का एहसास हासिल कर के क्यों नहीं देख लेते ? जोड़ने का सुख , तोड़ने के दुःख से कहीं बेहतर एहसास होता है !

Saturday, November 15, 2014

मौत का तांडव



छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में नसबंदी शिविर में चले मौत के तांडव ने अनगिनत सवाल खड़े कर दिए है। सरकार द्वारा लगाए गए विशेष शिविर में एक डॉक्टर ने मात्र 6 घंटे में 83 महिलाओं की नसबंदी कर डाली, जबकि नियम के मुताबिक एक दिन में एक डॉक्टर केवल 35 नसबंदी ही कर सकता है। ऑपरेशन की स्थितियों के बारे में अधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है, लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक इसमें जंग लगे औजार इस्तेमाल किए गए थे। शिविर में इस्तेमाल किये गई दवाइयां मानक के अनुरूप नहीं थी , जो शायद इस घटना की सबसे बड़ी वजह बन गई। बताया जा रहा है कि इन दवाइयों में पेस्टीसाइड की मात्रा खतरनाक स्तर तक पाई गई । यह भयानक घटना ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य सेवा की पोल खोलती है। आखिर इन दवाओं को चुनने की निर्धारित प्रक्रिया को चंद सिक्कों के लिए दरकिनार किये जाने से दर्ज़नों परिवारों को उम्र भर के लिए न भूलने लायक दर्द दे दिया गया ।
लेकिन इससे एक और बड़ा सवाल उभर कर आया है, जिससे मुंह फेरने की कोशिश की जा रही है । शिविरों में की जाने वाली सामूहिक नसबंदी के लिए ट्यूबेक्टमी का चुनाव बिल्कुल गलत है। इसमें औरतों की मौत की घटनाएं पहले भी घट चुकी हैं,लेकिन हमने और हमारी सरकारों ने इसको आज भी जारी रखा है ।सिर्फ लक्ष्य हासिल करने की चाह से किये जाने वाले इस सरकारी कार्यक्रम से सामाजिक सरोकारों को कितना नुकसान पहुँच सकता है। इसकी फ़िक्र किसी स्तर पर दिखाई नहीं पड़ती। आंकड़े बताते हैं कि देश भर में होने वाले नसबंदी के मामलों में 95% महिलाओं की संख्या होती है ।जोकि इस मामले में भी पुरुष प्रधान समाज के  वर्चस्व को ही दर्शाता है । जबकि पुरुषों के लिए अपनाई जाने वाली विधि , महिलाओं के लिए अपनाई जाने वाली विधि ट्यूबेक्टमी के मुकाबले काफी आसान और काफी कम जोखिम वाली होती है । लेकिन आम तौर पर शिविरों में महिलाओं को ही  जनसँख्या नियंत्रण के अभियान में बलि का बकरा बनाया जाता है ।अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकारी तंत्र भी सब कुछ जानते हुए भी आँखें मूँद लेता है ।
जनसंख्या नियंत्रण जरूरी है, लेकिन इसके लिए बेहतर स्वास्थ्य ढांचा विकसित करना होगा और लोगों में जागरूकता बढ़ानी होगी। साथ ही जो प्रदूषित दवाओं का खेल पूरे देश में धड़ल्ले से चल रहा है , उस पर भी लगाम लगाना जरुरी है। वरना इस तरह के हादसों को रोक पाना हमारे बस में नहीं होगा ।  इसके लिए राज्य सरकारों के साथ साथ केंद्र सरकार को भी जरुरी दिशा निर्देश जारी करके कड़ी कार्यवाही को अंजाम देना होगा । गौरतलब है कि ग्रामीण इलाकों में इस तरह की दवाओं से मौतों के छुट-पुट मामले होते ही रहते हैं , जिनकी संख्या इस तरह के शिविरों में ही बढ़ी नज़र आती है । लेकिन घटनाएँ तो बदस्तूर जारी हैं । बस देरी हमारे , और हमारी सरकारों के जागने की है ।

Friday, November 14, 2014

अमन की राह के मुसाफिर : हमारी धरोहर -- सूफी अम्बा प्रसाद

अमन की राह के मुसाफिर : हमारी धरोहर -- सूफी अम्बा प्रसाद: हमारी धरोहर -- सूफी अम्बा प्रसाद  -------------------------- ----------- रूहेलखंड की धरती ने आजादी के अनगिनत सपूतों को जन्म दिया । इनमे एक ...

अमन की राह के मुसाफिर : हमारी धरोहर -- रामपुर : बापू की दूसरी समाधि

अमन की राह के मुसाफिर : हमारी धरोहर -- रामपुर : बापू की दूसरी समाधि: नवाबों के शहर रामपुर का नाम अपनी तहज़ीब , लज़ीज़ खानों से लेकर रज़ा लाइब्रेरी तक के लिए मशहूर है लेकिन हम सब नहीं जानते कि उत्तर प्रदेश ...

हमारी धरोहर -- रामपुर : बापू की दूसरी समाधि

नवाबों के शहर रामपुर का नाम अपनी तहज़ीब , लज़ीज़ खानों से लेकर रज़ा लाइब्रेरी तक के लिए मशहूर है लेकिन हम सब नहीं जानते कि उत्तर प्रदेश का यह छोटा सा जिला अमन के सिपाही “ गांधी जी ” से भी एक ऐसा अटूट रिश्ता कायम कर गया , जिसकी मिसाल दुर्लभ है ।
 जैसा कि हम सभी जानते हैं की महात्मा गांधी की समाधि दिल्ली के राजघाट पर मौजूद है । लेकिन एक सच ऐसा भी है जिससे लोग अनजान हैं । राष्ट्रपिता की अस्थियां रामपुर में नवाब गेट के सामने मुख्य चौक पर स्थित समाधि में भी दफन हैं। यानी गांधी जी की एक समाधि रामपुर में भी मौजूद है। एक तरफ जहाँ पूरा देश राष्ट्रपिता को श्रध्दांजलि देने राजघाट पहुँचता है , रामपुर की इस भूली-बिसरी धरोहर से लोग अनजान हैं । तीस जनवरी, 1948 को जब महात्मा गांधी की हत्या हुई, तत्कालीन नवाब नवाब रजा अली खां इस घटना से काफी व्यथित हो गए । 10 फरवरी को नवाब साहब अपने कुछ रिश्तेदारों और कुछ प्रतिष्ठित लोगों के साथ बापू की अस्थियां लेने दिल्ली पहुंच गए । नवाब रजा अली खां के साथ पंडित राधे मोहन चौबे ,पंडित राम रतन, पंडित राम चंद्र, राम गोपाल शर्मा, और मदन मोहन चौबे इत्यादि थे। महात्मा गांधी के बेटे देवदास गांधी से उन्होंने अस्थियां हासिल कीं । अस्थियों के लिए रामपुर से 18 सेर वजनी अष्टधातु का कलश ले जाया गया था । 11 फरवरी को सुबह 9 बजे स्पेशल ट्रेन से अस्थि कलश रामपुर लाया गया। रामपुर में बापू की याद में जन सैलाब उमड़ पड़ा था । 12 फरवरी को रामपुर में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया था । उल्लेखनीय है कि बापू की हत्या के अगले दिन 31 जनवरी से ही रामपुर रियासत में 13 दिन का सरकारी शोक घोषित किया गया था ।

सर्वधर्म सभा के उपरान्त अस्थिकलश को हाथी पर रख कर कोसी नदी पर ले जाया गया । यहाँ पर नवाब रजा अली खां नें कुछ अस्थियां कोसी में विसर्जित की । शेष बची अस्थियों को मातमी धुन के साथ नवाब गेट लाया गया । यहाँ पर इनको चांदी के कलश में रखकर दफ़न कर दिया गया । और इस तरह शान्ति के उस अमर अग्रज से रामपुर ने अपना नाता सदा के लिए जोड़ लिया ।  (आमिर खुर्शीद मलिक )