सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!

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AMIR KHURSHEED MALIK
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Saturday, November 22, 2014

शाहजहांपुर रंगकर्म की नीव : चंद्रमोहन महेन्द्रू

शाहजहांपुर की रंगयात्रा की नींव के पत्थरों में से एक उल्लेखनीय नाम चंद्रमोहन महेन्द्रू का है ! जनपद में रामलीला के नायाब मंचन हों , या फिर पारसी रंगमंच से प्रभावित ऐतिहासिक नाटकों का दौर ! आधुनिक रंगमंच के तकनीकी पक्षों से सजे-संवरे सामाजिक नाटको का मंचन हो , या फिर राष्ट्रीय स्तर पर शाहजहांपुर के समर्द्ध रंगमंच की पताका फहराने की बात हो , चंद्रमोहन “महेन्द्रू” का नाम हर जगह ऊँचाइयों पर रहा !

चंद्रमोहन “महेन्द्रू” का जन्म 19 नवम्बर 1944 को पाकिस्तान में एक पंजाबी क्षत्रिय परिवार में हुआ ! उनका परिवार बंटवारे के बाद देहरादून,लुधियाना होता हुआ 1955 में शाहजहांपुर आ गया ! चंद्रमोहन “महेन्द्रू” को रंगकर्म विरासत में मिला था ! उनके पिता स्वर्गीय चमन लाल “महेन्द्रू” एक अच्छे रंगकर्मी और गायक थे ! उनसे मिली प्रेरणा और प्रोत्साहन की बदौलत चंद्रमोहन “महेन्द्रू” का रुझान धीरे-धीरे रंगकर्म की ओर बढ़ता चला गया ! आर्थिक झंझावातों नें उनकी राह रोकी , पर उनका यह जूनून समय के साथ बढ़ता चला गया ! अपनी पढाई के दौरान ही उन्हें “सिकंदर और पोरस” नाटक में अभिनय का मौका मिला ! यह उनके रंगमंच का पहला पडाव था ! 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान ऑर्डिनेंस क्लोदींग फैक्ट्री में भर्ती होने का मौका मिला , जिससे परिवार के हालात सुधारने के साथ-साथ रंगमंच से प्रभावी तरीके से जुड़ने का मौका भी जय नाट्यम संस्था के मार्फ़त उन्हें मिल गया !

इसी दौरान शाहजहांपुर में नाटको की सफलता से उत्साहित होकर “ऑर्डिनेंस ड्रामेटिक क्लब” का गठन किया गया  ! जिसमें चंद्रमोहन “महेन्द्रू” को अपनी प्रतिभा दिखने का मौका मिला ! 1971 में चंद्रमोहन “महेन्द्रू” को “ऑर्डिनेंस ड्रामेटिक क्लब” की रामलीला में प्रवेश मिल गया ! उन्होंने रामलीला में रावण,परशुराम,दशरथ जैसी चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं उन्होंने निभाई ! इस बीच उनका जुडाव जय नाट्यम संस्था से बना रहा ! इसी दौरान शाहजहांपुर के रंगमंच में क्रांतिकारी बदलाव आया ! आधुनिक रंगमंच ने शाहजहांपुर में दस्तक दी ! साहित्यिक संस्था “अनामिका” नें नाट्य क्षेत्र में पदार्पण किया ! भोपाल के नाट्य निर्देशक कमल वशिष्ठ ने आधुनिक रंगमंच की बारीकियों को एक वर्कशॉप के द्वारा समझाया ! तत्पश्चात असग़र वजाहत के नाटक “इन्ना की आवाज” का मंचन भी किया गया ! इस मंचन में चंद्रमोहन “महेन्द्रू” की प्रतिभा का बेहतरीन पक्ष सामने उभर कर आया  ! इसी दौरान चेखव की कहानी “गिरगिट” का भी मंचन किया गया ! 1984 में आयोजित एक और वर्कशॉप में अमरेन्द्र सहाय अमर ने नाटक “कोणार्क” को तैयार कराया , जिसकी केन्द्रीय भूमिका के लिए चंद्रमोहन “महेन्द्रू” को चुना गया ! उन्होंने अपने पात्र के साथ पूरा न्याय किया ! इस नाटक के बाद में कई मंचन भी हुए ! 1985 में “एक था गधा उर्फ़ अलादाद खान” में भी उनकी भूमिका प्रशंसा का विषय बनी !


1986 में बनी “कोरोनेशन” के संस्थापक ज़रीफ़ मलिक आनंद नें अपनी पहली प्रस्तुति “प्रमोशन” के निर्देशन का दायित्व चंद्रमोहन “महेन्द्रू” को ही सौंपा ! निर्देशन से जुड़ने के बाद उन्होंने “जनता पागल हो गई है”, “छत पुरानी” , “सिंहासन खाली है” आदि कई प्रमुख प्रस्तुतियों को निर्देशन से सवारा !उन्होंने टेलीफिल्म “सलाह”में भी काम किया ! 1989 में संस्कृति पर फासीवादी हमले के विरुद्ध हुए प्रदर्शनों में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही !

शाहजहांपुर में नुक्कड़ नाटक को लाने और निर्देशन का सौभाग्य चंद्रमोहन “महेन्द्रू” को ही मिला ! 1989 में जसम के बैनर तले “जागो-जागो” के तीन मंचन एक उदाहरण बन गए !राजेश कुमार लिखित नुक्कड़ नाटक “हमें बोलने दो” ,महेश सक्सेना द्वारा लिखित नाटक “दिशा” ,सर्वेश्वर दयाल शर्मा रचित “बकरी”, में उन्होंने निर्देशन किया ! “बकरी” को अखिल भारतीय नाटक प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी मिला ! राजेश कुमार के साथ उन्होंने “आखिरी सलाम” का संयुक्त निर्देशन किया !प्रेमचंद की “पूस की रात” के  अपने निर्देशन में रौनक अली के अभिनय से संवरे 50 शो कराये , जोकि अपने आप में एक कीर्तिमान बन गया ! 2005 में भुवनेश्वर के नाटक “सिकंदर” का निर्देशन,चंद्रमोहन दिनेश की कहानी “एक दा विकास खंडे” का नाट्य रूपांतरण और निर्देशन ,मीरा कान्त के नाटक “भुवनेश्वर दर भुवनेश्वर” का निर्देशन उनकी विशिष्ठ उपलब्धि रही ! इसके अलावा भी ढेरों नाटकों और प्रस्तुतियों में वह भागीदार रहे हैं ! 
 चंद्रमोहन
“महेन्द्रू” को 1998 में जनपद रत्न से सम्मानित किया गया !इसके अतिरिक्त उन्हें परिक्रमा,संकल्प,गांधी पुस्तकालय, ऑर्डिनेंस ड्रामेटिक क्लब,संस्कृति एकता मंच,द्वारा भी सम्मानित किया गया ! उनको गांगुली स्मृति सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला ! राष्ट्रीय साहित्य कला संस्थान द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया गया ! मशहूर फ़िल्मी कलाकार राजपाल यादव ने भी उनके नाटक में काम किया है !चंद्रमोहन “महेन्द्रू” की रंग यात्रा को कुछ शब्दों में समेटना मुश्किल है !  शाहजहांपुर का रंगकर्म उनके बहुमूल्य योगदान का गवाह है !

Sunday, November 2, 2014

हमारी धरोहर : भुवनेश्वर

हमारी धरोहर : भुवनेश्वर
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हमारी धरोहर की श्रंखला में आज रूहेलखंड के अमर साहित्यकार भुवनेश्वर से आप को रूबरू कराने का प्रयास कर रहा हूँ । भुवनेश्वर जैसी शख्सियत को शब्दों में समेट कर प्रस्तुत करना मेरे जैसे व्यक्ति के लिए संभव नहीं है । परन्तु प्रयास कर रहा हूँ कि इतिहास के उन अनमोल पलों को हम अनुभव कर सकें । जिनमे भुवनेश्वर जैसा लेखक शाहजहांपुर से निकल कर साहित्य पटल पर अमिट छाप छोड़ गया ।
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भुवनेश्वर साहित्य जगत का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में लीक से अलग किस्म का साहित्य सृजन किया । भुवनेश्वर नें मध्य वर्ग की विडंबनाओं को कटु सत्य के प्रतीरूप में उकेरा। उन्हें आधुनिक एकांकियों के जनक होने का गौरव भी हासिल है । एकांकी, कहानी, कविता, समीक्षा जैसी कई विधाओं में भुवनेश्वर ने साहित्य को नए तेवर वाली रचनाएं दीं। एक ऐसा साहित्यकार जिसने अपनी रचनाओं से आधुनिक संवेदनाओं की नई परिपाटी विकसित की। प्रेमचंद जैसे साहित्यकार ने उनको भविष्य का रचनाकार माना था। इसकी एक ख़ास वजह यह थी कि भुवनेश्वर अपने रचनाकाल से बहुत आगे की सोच के रचनाकार थे। उनकी रचनायों में कलातीतता का बोध है , परन्तु आश्चर्यजनक रूप से से यह भूतकाल से न जुड़ कर भविष्य के साथ ज्यादा प्रासंगिक नज़र आती हैं । ‘कारवां’ की भूमिका में स्वयं भुवनेश्वर ने लिखा है कि ‘विवेक और तर्क तीसरी श्रेणी के कलाकारों के चोर दरवाज़े हैं” । उनका यह मानना उनकी रचनायों में स्पष्टतया द्रष्टिगोचर भी होता भी है। इंसान को वस्तु में बदलते जाने की जो तस्वीर उन्होंने उकेरी , वो आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।
भुवनेश्वर का जन्म शाहजहांपुर के केरुगंज (खोया मंडी) में, 1910 में एक खाते-पीते परिवार में हुआ था। परन्तु बचपन में ही माँ की मौत से अचानक परिस्थितियां उनके विपरीत हो गई । इंटरमीडिएट का ये विद्यार्थी शाहजहांपुर को अलविदा करके इलाहाबाद चला गया। उस समय के भुवनेश्वर का बौदिक ज्ञान ,हिन्दी-अंग्रेजी भाषाओँ पर समान अधिकार , इंसानी रिश्तों को समझने का अदभुत नजरिया समकालीन लेखकों के लिए अचरज से कम नहीं था। परन्तु व्यक्तिगत रूप से स्वयं भुवनेश्वर का जीवन आभावों एवं कठिनताओं का पुलिंदा था । इलाहाबाद,बनारस,लखनऊ में भटकते भुवनेश्वर के लिए मित्र मंडली के घर आसरा, और कठिनाइयों का चोली दामन का साथ रहा । परन्तु इन परेशानियों में भी उनकी साहित्य यात्रा अनवरत जारी रही । एक बार स्वयं प्रेमचंद ने उनसे अपने लेखन में ‘कटुता’ कम करने की राय दी थी ,जिस पर उन्होंने कहा कि इस ‘कटुता’ की उपज के पीछे के कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिये।शायद यही कारण , वो तमाम विसंगतियां थी , जिनका सामना उन्हें अपने जीवन में करना पड़ा ।1957 में लखनऊ स्टेशन पर भुवनेश्वर ने दुनिया को अलविदा कह दिया ।
भुवनेश्वर की साहित्य साधना बहुआयामी थी । कहानी,कविता,एकांकी,और समीक्षा सब में उनकी लेखनी एक नए कलेवर का एहसास दिलाती है । छोटी सी घटना को भी नई ,परन्तु वास्तविकता के सर्वाधिक सन्निकट द्रष्टि से देखने का नजरिया भुवनेश्वर की विशेषता है ।
हंस’ में 1933 में भुवनेश्वर का पहला एकांकी ‘श्यामा: एक वैवाहिक विडम्बना’ प्रकाशित हुआ था । 1935 में प्रकाशित एकांकी संग्रह ‘कारवां’ ने उन्हें एकांकीकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। भुवनेश्व र द्वारा लिखित नाटक ‘तांबे का कीड़ा’ (1946) को विश्व की किसी भी भाषा में भी लिखे गये पहले असंगत नाटक का सम्मान प्राप्त है। उनके द्वारा लिखित एकांकियों में ‘श्यामःएक वैवाहिक विडम्वना’, ‘रोमांसःरोमांच’, ‘स्ट्राइक’, ‘ऊसर’, ‘सिकन्दर’ आदि का नाम उल्लेखनीय है।
भुवनेश्वर की पहली कहानी ‘मौसी’ को प्रेमचंद ने समकालीन कहानियों के प्रतिनिधि संकलन ‘हिंदी की आदर्श कहानियां’ में स्थान दिया। उनकी कहानी ‘भेडिये’ हंस के अप्रैल 1938 अंक में प्रकाशित हुई । इस कहानी ने आधुनिक कहानियों की परम्परा में मज़बूत नीव का निर्माण किया । कैसे रेगिस्तान से गुजरता बंजारा भेडिय़ों से जान बचाने के लिए उनके आगे चुग्गा फेंकता है। कहानी और जीवन दोनों में फेंकने के इस क्रम में सबसे पहले फेंकी जाती हैं वो चीजें जो अपेक्षाकृत कम महत्व की हैं। इस कहानी ने जीवन की कडवी सच्चाई को बिना लाग-लपेट के प्रस्तुत किया। कुछ साहित्यकार तो इस कहानी के मर्म को किसी मैनेजमेंट क्लास के चुनिन्दा निष्कर्षों में भी सर्वश्रेष्ट मानते हैं। ‘मौसी’, ‘लड़ाई’, ‘माँ बेटे’, ‘मास्टनी’ आदि अन्य उल्लेखनीय कहानियाँ हैं।
इसके अतिरिक्त भुवनेश्वर ने अंग्रेजी तथा हिन्दी में कुछ कविताएं तथा आलोचनात्मक लेख भी लिखे हैं। परन्तु उनके कृतित्व को पहचानने में लोगों ने भूल कर दी ।शायद यही कारण था, की इस अनोखे रचनाकार को पूरा जीवन संघर्षो और विवादों में गुजारना पड़ा । प्रेमचंद ने उनसे हंस से स्थाई रूप से जुड़ने का आग्रह किया था ।परन्तु अनजाने कारणों से ये संवाद पूरा ना हो सका । हालांकि उनकी रचनाये हंस में लगातार प्रकाशित होती रहीं । लेकिन अगर वो हंस के साथ जुड़ जाते तो उनका रचना संसार कहीं अधिक विस्तृत रूप में हमारे सामने होता । उनके अंतिम समय की रचनाओं को सहेजना वाला उनके साथ कोई नहीं था , जिसके फलस्वरूप उस दौरान रफ़ कागजों के पीछे लिखा गया हिंदी और अंग्रेजी का पूर्णतया मौलिक साहित्य अंधेरों में गुम हो गया ।
भुवनेश्वर की उपलब्ध सभी रचनाओं को आज पुनः लोगों तक पंहुचाने की आवश्यकता है । आज के साहित्यकारो को भी देखना चाहिए कि आज के परिवेश में भी कहीं अधिक प्रासंगिक भुवनेश्वर की रचनाये सर्वाधिक विपरीत परस्थितियों में कैसे परवान चढ़ीं । धन्य है रूहेलखंड की धरती जिसने भुवनेश्वर जैसे लेखक को जन्म दिया । ( आमिर खुर्शीद मलिक )