सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!

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AMIR KHURSHEED MALIK
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Friday, March 13, 2015

दामोदर स्वरूप 'विद्रोही' : वीर रस के कालजयी रचनाकार

 
शाहजहाँपुर को गर्व है कि अनगिनत शहीदों को देश के लिए समर्पित करने वाली उसकी भूमि ने साहित्य जगत के विशिष्ठ हस्ताक्षरों को भी जन्म दिया है । ऐसे ही एक सशक्त हस्ताक्षर विख्यात कवि दामोदर स्वरूप 'विद्रोही'  जी अब हमारे बीच नहीं है,परन्तु उनके क्रांतिकारी तेवरों वाली रचनाओं से हिंदी साहित्य जगत अभिभूत है ।
"मैं लिख न सका कुछ भी रिसालों के वास्ते,
उत्तर न बन सका हूँ सवालों के वास्ते।
लेकिन सियाह रात जब छायेगी मुल्क पे,
मेरी तलाश होगी उजालों के वास्ते।"
दामोदर स्वरूप 'विद्रोही'  का जन्म 2 अक्टूबर 1928 को शाहजहाँपुर जनपद की पुवायाँ तहसील के ग्राम मुड़िया पवार में मुरारीलाल गुप्त के घर हुआ। बचपन में ही माँ का साया सर से उठ गया , उधर अंग्रेज़ों के खिलाफ बगावत की चल रही हवा के चलते उनके पिता को भी भूमिगत होना पड़ा । ऐसे में अपने जीवन की राह उन्होंने भी क्रान्ति की दिशा में ही मोड़ ली ।अपना उपनाम विद्रोही रखने के साथ ही उन्होंने जनजागरण की कवितायें सुनानी शुरू कर दी । परेशानियों से जूझने के बावजूद उन्होंने शिक्षा ग्रहण करना जारी रखा ।एम.ए. की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने नौकरी करनी शुरू की , पर समझौता उनके लिए सहज नहीं था , परिणामस्वरूप त्यागपत्र देना ही उन्हें ठीक लगा । नौकरी को ठोकर मारने के बाद उनका लेखकीय सफ़र और भी ज्यादा प्रभावी होता चला गया । एक लम्बे समय तक मंच पर वीर रस के प्रतिष्ठित कवि के रूप में उन्हें जाना गया ।हालांकि उनके लिखे गीत ,ग़ज़ल,और मुक्तक भी अपनी छाप बखूबी छोड़ जाते थे । उनके द्वारा किये गए व्यवस्था और अत्याचार पर प्रहार कवि सम्मेलनो में तालियों की गडगडाहट बटोरने में सदा कामयाब रहे । "दिल्ली की गद्दी सावधान" नामक अपनी रचना से पूरे देश में चर्चित हुए विद्रोही जी निजी जीवन में भी गलत को गलत कहने का साहस दिखाते रहे ।उनके इस गुण को गीतकार अजय गुप्त ने अपने शब्दों में संजोते हुए कहा था कि  "गर चापलूस होते तो पुरखुलूस होते, चलते न यूँ अकेले पूरे जुलूस होते।"
राष्ट्र के लिए अदभुत अनुराग उनकी विशेषता थी । वो समय के साथ निष्ठाएं बदलने के सख्त खिलाफ थे । उनकी कविताओं में भी यह बखूबी नज़र आती है ।
"बहक जाये हवा के साथ ही जब राष्ट्र का चिंतन,
जहाँ का बुद्धिजीवी स्वार्थ-सुविधा में भटकता हो।
तो ऐसा व्यक्ति कवि चिंतक मनीषी हो नहीं सकता,
कि जिसका शब्द दुविधा की सलीबों पर लटकता हो।"
उनकी प्रमुख रचनाओं में दिल्ली की गद्दी सावधान (आग्नेय कवितायें),गुलाम शैशव (प्रारम्भिक काल की कवितायें),मेरे श्रद्धेय (महापुरुषों पर कवितायें),समय के दस्तावेज (इतिहासपरक रचनायें),हार हमारी जीत तुम्हारी (गीत संग्राह),त्रिधारा (गजल, मुक्तक व छन्द),कसक (करुण काव्य), दीवार के साये में (आत्मकथा) से उनके रचना संसार की व्यापकता का अंदाजा होता है। आदर्श श्रीवास्तव ने दामोदर स्वरूप विद्रोही : व्यक्तित्व एवं कृतित्व (वीर रस, राष्ट्रीयता तथा मंच के विशेष संदर्भ में) विषय पर  डॉ॰ एम० आर० खान आफरीदी के निर्देशन में पी०एचडी० की उपाधि प्राप्त की। विद्रोही जी को साहित्य भूषण, (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ)निराला पुरस्कार, (रायसेन-मध्य प्रदेश),सुमन पुरस्कार, (उन्नाव), भगवती चरण वर्मा पुरस्कार, (सफीपुर उत्तर प्रदेश),राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन जन्मशती सम्मान, राष्ट्र्भाषा हिन्दी प्रचार समिति(मुरादाबाद),शान्ति कुंज रामाश्रम का राजहंस सम्मान,और जनपद रत्न,( अटल बिहारी वाजपेयी जन्म-दिवस समारोह समिति, शाहजहाँपुर) सहित सैकड़ों पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। लेकिन इन सम्मानों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उनके चाहने वालों का वह सम्मान है जो वो अपने प्रिय कवि से करते आये हैं , और आगे भी करते रहेंगे । 11 मई 2008 को वो हम सबको छोड़ कर चले गए । उनकी कमी तो पूरी नहीं हो सकती , परन्तु उनका समर्द्ध रचना संसार हम सबके लिए अनमोल धरोहर है ।   उनके बेटे विवेक गुप्ता ने उनकी याद में विद्रोही स्मृति न्यास के तत्वाधान में प्रति वर्ष दो अक्टूबर को शाहजहाँपुर के गान्धी भवन में समारोह करके रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय से एम०ए० (हिन्दी) में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी अथवा अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन करके किसी एक कवि को विद्रोही स्मृति सम्मान दे रहे हैं ।इससे हम सबके बीच विद्रोही जी की मौजूदगी को जीवंतता मिल गई है। उनकी रचना देखिये ......

कुछ लोग जी रहे हैं यूँ आचरण बदलकर, शैतान पुज रहे हैं ज्यों आवरण बदलकर! 
कोई न अन्यथा ले मेरा सहज समर्पण, रख दूँगा एक पल में वातावरण बदलकर!
ऐसे भी हैं यहाँ कवि लिखकर के एक कविता, वर्षों सुना रहे हैं कुछ उद्धरण बदलकर!
अब इनको क्या कहूँ मैं जनता 'जनार्दन' है, संध्या उठा के लाये नव जागरण बदलकर! 
गीतों के पद ढले हैं संगीत के सुरों में, पाणिनि का श्राद्ध होता है व्याकरण बदलकर! 
भगवान मौत देना सम्मान वह न देना, स्वीकारना पड़े जो अन्त:करण बदलकर!



Sunday, November 30, 2014

क्रांतिकारी साहित्य का विशिष्ठ नाम : सुधीर “विद्यार्थी”

आइये आज रूबरू होते हैं किसी ऐसे नाम से ,जिसमें देश के स्वतंत्रता संग्राम को उसके वास्तविक स्वरुप के साथ उकेरने का जूनून हो ।  जो सफल नाटककार हो, अभिनेता, लेखक,कवि जैसे अनगिनत नैसर्गिक तमगे उसमें अपने विशिष्ठ स्वरुप में विराजमान हों ।  यकीनन ऐसे विलक्षण पैमाने पर सुधीर “विद्यार्थी” जैसा नाम ही सटीक बैठता है । क्रांतिकारी साहित्य से अलख जगाने वाला यह लेखक श्रमिक आन्दोलन से लेकर सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए जाना जाता है ।  “भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का सही मूल्यांकन नहीं हुआ है” ऐसा मानने वाले सुधीर “विद्यार्थी” ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की परतों को ज़मीनी स्तर पर जा कर ढूंढा है पैदल यात्रा हो या साइकिल से दूर दराज़ के क्षेत्र में खोजबीन , सुधीर “विद्यार्थी” नें कोई कसर नहीं छोड़ी । यही कारण है कि क्रांतिकारी साहित्य में उनकी खोज और कृतित्व अपना बेमिसाल स्थान रखते हैं । इन किताबों और लेखों से शहीदों की दुर्लभ जानकारियाँ लोगों तक पहुँच पाई । शहीदों के परिवारों तक पहुँच कर उनको आर्थिक सहायता और सही पहचान दिलवाने में भी उनके प्रयास अनूठे रहे हैं । यकीनन इन सबके लिए जिस इन्क़लाबी तेवरों की ज़रूरत होती है , वह सुधीर “विद्यार्थी” के अन्दर हैं ।


1 अक्टूबर 1953 को जन्में सुधीर “विद्यार्थी” का पूरा जीवन भारत की क्रांति गाथा को समर्पित रहा । सुधीर “विद्यार्थी” नें अशफाकउल्ला, रोशन सिंह , भगत सिंह , मौलवी अहमदुल्लाह शाह,बटुकेश्वर दत्त और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे कई शहीदों और क्रांतिकारियों पर दर्जनों किताबे लिखीं हैं । उनके कृतित्व में क्रांतिकारी विरासत को सच्चाई को अगली पीढ़ी तक सही रूप में पहुचाने का जुनून साफ़ नज़र आता है । उनकी प्रमुख कृतियों में अशफाकउल्ला और उनका युग, शहीद रोशन सिंह ,उत्सर्ग,भगत सिंह की सुनें, आमादेर विप्लवी, शहीद मौलवी अहमदुल्लाह शाह,काला पानी का ऐतिहासिक दस्तावेज़,अग्निपुंज जैसे अनगिनत नाम शामिल है । अपराजेय योद्दा कुंवर भगवान सिंह,मेरा राजहंस,शहीदों के हमसफ़र,गदर पार्टी से भगतसिंह,  क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त,आज का भारत और भगतसिंह, क्रांति की इबारतें आदि से उनको काफी चर्चा मिली । एनसीआरटी की कक्षा 11 की पुस्तक साहित्य मञ्जूषा में क्रांति की प्रतिमूर्ति : दुर्गा भाभी, तथा कक्षा 5 में शहीद रोशन सिंह लेख पाठ्यक्रम में सम्मिलित किये गए हैं । विभिन्न विश्वविद्यालयों में क्रांतिकारी आन्दोलन पर उनके व्याख्यान सराहे जा चुके हैं । शाहजहांपुर में शहीद रामप्रसाद बिस्मिल,रोशनसिंह, अशफाक़उल्ला खां, मौलवी अहमदुल्लाह शाह के स्मारकों के निर्माण के लिए उनके प्रयास हम सब जानते हैं।  बीसलपुर में शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की प्रतिमा और पार्क का निर्माण,  बरेली में क्रांतिकारी दामोदर स्वरुप सेठ एवं ठाकुर पृथ्वी सिंह उद्यान का निर्माण उनके संघर्ष की उपलब्धियों में शामिल हैं । 1979 में शाहजहांपुर में अखिल भारतीय क्रांतिकारी सम्मलेन उनके इस संघर्ष की नीव मानी जा सकती है।  उन्होंने 1981 में समाचारपत्र “साथी” के चंद्रशेखर आज़ाद विशेषांक, साहित्यिक पत्रिका “संदर्श”, में संपादन में भी अपने जौहर दिखाए हैं । उनका एक अलग पहलू अभिनय भी है । उन्होंने लगातार 20 वर्षों तक नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से समाज के हर तबके से सीधे संवाद स्थापित किया है।  शाहजहांपुर की नाट्य संस्था “विमर्श” के वह अध्यक्ष भी रहे ।
क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास लेखन के लिए उन्हें 1997 का “परिवेश सम्मान” और 2013 का “गणमित्र सम्मान” दिया गया । उनको लेखन के लिए “शमशेर सम्मान” और “अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान” मिला ।  उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर रूहेलखंड विश्वविद्यालय में शोध प्रबंध किया जा चूका है । कविता भारत के सम्पादन में उन पर केन्द्रित एक पुस्तक “ जमीन को देखती आँखें” प्रकाशित हो चुकी है । हम सब उनकी आने वाली पुस्तकों “क्रान्ति की ज़मीन पर” , “भगत सिंह : एक विमर्श” ,”क्रांतिकारी आन्दोलन : एक पुनर्पाठ” का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं।  जिनमें यकीनन इतिहास के कुछ अनखुले पन्नो से हम रुबरू हो सकेंगें ।  




Friday, November 14, 2014

अमन की राह के मुसाफिर : हमारी धरोहर -- सूफी अम्बा प्रसाद

अमन की राह के मुसाफिर : हमारी धरोहर -- सूफी अम्बा प्रसाद: हमारी धरोहर -- सूफी अम्बा प्रसाद  -------------------------- ----------- रूहेलखंड की धरती ने आजादी के अनगिनत सपूतों को जन्म दिया । इनमे एक ...

हमारी धरोहर -- रामपुर : बापू की दूसरी समाधि

नवाबों के शहर रामपुर का नाम अपनी तहज़ीब , लज़ीज़ खानों से लेकर रज़ा लाइब्रेरी तक के लिए मशहूर है लेकिन हम सब नहीं जानते कि उत्तर प्रदेश का यह छोटा सा जिला अमन के सिपाही “ गांधी जी ” से भी एक ऐसा अटूट रिश्ता कायम कर गया , जिसकी मिसाल दुर्लभ है ।
 जैसा कि हम सभी जानते हैं की महात्मा गांधी की समाधि दिल्ली के राजघाट पर मौजूद है । लेकिन एक सच ऐसा भी है जिससे लोग अनजान हैं । राष्ट्रपिता की अस्थियां रामपुर में नवाब गेट के सामने मुख्य चौक पर स्थित समाधि में भी दफन हैं। यानी गांधी जी की एक समाधि रामपुर में भी मौजूद है। एक तरफ जहाँ पूरा देश राष्ट्रपिता को श्रध्दांजलि देने राजघाट पहुँचता है , रामपुर की इस भूली-बिसरी धरोहर से लोग अनजान हैं । तीस जनवरी, 1948 को जब महात्मा गांधी की हत्या हुई, तत्कालीन नवाब नवाब रजा अली खां इस घटना से काफी व्यथित हो गए । 10 फरवरी को नवाब साहब अपने कुछ रिश्तेदारों और कुछ प्रतिष्ठित लोगों के साथ बापू की अस्थियां लेने दिल्ली पहुंच गए । नवाब रजा अली खां के साथ पंडित राधे मोहन चौबे ,पंडित राम रतन, पंडित राम चंद्र, राम गोपाल शर्मा, और मदन मोहन चौबे इत्यादि थे। महात्मा गांधी के बेटे देवदास गांधी से उन्होंने अस्थियां हासिल कीं । अस्थियों के लिए रामपुर से 18 सेर वजनी अष्टधातु का कलश ले जाया गया था । 11 फरवरी को सुबह 9 बजे स्पेशल ट्रेन से अस्थि कलश रामपुर लाया गया। रामपुर में बापू की याद में जन सैलाब उमड़ पड़ा था । 12 फरवरी को रामपुर में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया था । उल्लेखनीय है कि बापू की हत्या के अगले दिन 31 जनवरी से ही रामपुर रियासत में 13 दिन का सरकारी शोक घोषित किया गया था ।

सर्वधर्म सभा के उपरान्त अस्थिकलश को हाथी पर रख कर कोसी नदी पर ले जाया गया । यहाँ पर नवाब रजा अली खां नें कुछ अस्थियां कोसी में विसर्जित की । शेष बची अस्थियों को मातमी धुन के साथ नवाब गेट लाया गया । यहाँ पर इनको चांदी के कलश में रखकर दफ़न कर दिया गया । और इस तरह शान्ति के उस अमर अग्रज से रामपुर ने अपना नाता सदा के लिए जोड़ लिया ।  (आमिर खुर्शीद मलिक )



Sunday, November 2, 2014

हमारी धरोहर : भुवनेश्वर

हमारी धरोहर : भुवनेश्वर
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हमारी धरोहर की श्रंखला में आज रूहेलखंड के अमर साहित्यकार भुवनेश्वर से आप को रूबरू कराने का प्रयास कर रहा हूँ । भुवनेश्वर जैसी शख्सियत को शब्दों में समेट कर प्रस्तुत करना मेरे जैसे व्यक्ति के लिए संभव नहीं है । परन्तु प्रयास कर रहा हूँ कि इतिहास के उन अनमोल पलों को हम अनुभव कर सकें । जिनमे भुवनेश्वर जैसा लेखक शाहजहांपुर से निकल कर साहित्य पटल पर अमिट छाप छोड़ गया ।
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भुवनेश्वर साहित्य जगत का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में लीक से अलग किस्म का साहित्य सृजन किया । भुवनेश्वर नें मध्य वर्ग की विडंबनाओं को कटु सत्य के प्रतीरूप में उकेरा। उन्हें आधुनिक एकांकियों के जनक होने का गौरव भी हासिल है । एकांकी, कहानी, कविता, समीक्षा जैसी कई विधाओं में भुवनेश्वर ने साहित्य को नए तेवर वाली रचनाएं दीं। एक ऐसा साहित्यकार जिसने अपनी रचनाओं से आधुनिक संवेदनाओं की नई परिपाटी विकसित की। प्रेमचंद जैसे साहित्यकार ने उनको भविष्य का रचनाकार माना था। इसकी एक ख़ास वजह यह थी कि भुवनेश्वर अपने रचनाकाल से बहुत आगे की सोच के रचनाकार थे। उनकी रचनायों में कलातीतता का बोध है , परन्तु आश्चर्यजनक रूप से से यह भूतकाल से न जुड़ कर भविष्य के साथ ज्यादा प्रासंगिक नज़र आती हैं । ‘कारवां’ की भूमिका में स्वयं भुवनेश्वर ने लिखा है कि ‘विवेक और तर्क तीसरी श्रेणी के कलाकारों के चोर दरवाज़े हैं” । उनका यह मानना उनकी रचनायों में स्पष्टतया द्रष्टिगोचर भी होता भी है। इंसान को वस्तु में बदलते जाने की जो तस्वीर उन्होंने उकेरी , वो आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।
भुवनेश्वर का जन्म शाहजहांपुर के केरुगंज (खोया मंडी) में, 1910 में एक खाते-पीते परिवार में हुआ था। परन्तु बचपन में ही माँ की मौत से अचानक परिस्थितियां उनके विपरीत हो गई । इंटरमीडिएट का ये विद्यार्थी शाहजहांपुर को अलविदा करके इलाहाबाद चला गया। उस समय के भुवनेश्वर का बौदिक ज्ञान ,हिन्दी-अंग्रेजी भाषाओँ पर समान अधिकार , इंसानी रिश्तों को समझने का अदभुत नजरिया समकालीन लेखकों के लिए अचरज से कम नहीं था। परन्तु व्यक्तिगत रूप से स्वयं भुवनेश्वर का जीवन आभावों एवं कठिनताओं का पुलिंदा था । इलाहाबाद,बनारस,लखनऊ में भटकते भुवनेश्वर के लिए मित्र मंडली के घर आसरा, और कठिनाइयों का चोली दामन का साथ रहा । परन्तु इन परेशानियों में भी उनकी साहित्य यात्रा अनवरत जारी रही । एक बार स्वयं प्रेमचंद ने उनसे अपने लेखन में ‘कटुता’ कम करने की राय दी थी ,जिस पर उन्होंने कहा कि इस ‘कटुता’ की उपज के पीछे के कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिये।शायद यही कारण , वो तमाम विसंगतियां थी , जिनका सामना उन्हें अपने जीवन में करना पड़ा ।1957 में लखनऊ स्टेशन पर भुवनेश्वर ने दुनिया को अलविदा कह दिया ।
भुवनेश्वर की साहित्य साधना बहुआयामी थी । कहानी,कविता,एकांकी,और समीक्षा सब में उनकी लेखनी एक नए कलेवर का एहसास दिलाती है । छोटी सी घटना को भी नई ,परन्तु वास्तविकता के सर्वाधिक सन्निकट द्रष्टि से देखने का नजरिया भुवनेश्वर की विशेषता है ।
हंस’ में 1933 में भुवनेश्वर का पहला एकांकी ‘श्यामा: एक वैवाहिक विडम्बना’ प्रकाशित हुआ था । 1935 में प्रकाशित एकांकी संग्रह ‘कारवां’ ने उन्हें एकांकीकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। भुवनेश्व र द्वारा लिखित नाटक ‘तांबे का कीड़ा’ (1946) को विश्व की किसी भी भाषा में भी लिखे गये पहले असंगत नाटक का सम्मान प्राप्त है। उनके द्वारा लिखित एकांकियों में ‘श्यामःएक वैवाहिक विडम्वना’, ‘रोमांसःरोमांच’, ‘स्ट्राइक’, ‘ऊसर’, ‘सिकन्दर’ आदि का नाम उल्लेखनीय है।
भुवनेश्वर की पहली कहानी ‘मौसी’ को प्रेमचंद ने समकालीन कहानियों के प्रतिनिधि संकलन ‘हिंदी की आदर्श कहानियां’ में स्थान दिया। उनकी कहानी ‘भेडिये’ हंस के अप्रैल 1938 अंक में प्रकाशित हुई । इस कहानी ने आधुनिक कहानियों की परम्परा में मज़बूत नीव का निर्माण किया । कैसे रेगिस्तान से गुजरता बंजारा भेडिय़ों से जान बचाने के लिए उनके आगे चुग्गा फेंकता है। कहानी और जीवन दोनों में फेंकने के इस क्रम में सबसे पहले फेंकी जाती हैं वो चीजें जो अपेक्षाकृत कम महत्व की हैं। इस कहानी ने जीवन की कडवी सच्चाई को बिना लाग-लपेट के प्रस्तुत किया। कुछ साहित्यकार तो इस कहानी के मर्म को किसी मैनेजमेंट क्लास के चुनिन्दा निष्कर्षों में भी सर्वश्रेष्ट मानते हैं। ‘मौसी’, ‘लड़ाई’, ‘माँ बेटे’, ‘मास्टनी’ आदि अन्य उल्लेखनीय कहानियाँ हैं।
इसके अतिरिक्त भुवनेश्वर ने अंग्रेजी तथा हिन्दी में कुछ कविताएं तथा आलोचनात्मक लेख भी लिखे हैं। परन्तु उनके कृतित्व को पहचानने में लोगों ने भूल कर दी ।शायद यही कारण था, की इस अनोखे रचनाकार को पूरा जीवन संघर्षो और विवादों में गुजारना पड़ा । प्रेमचंद ने उनसे हंस से स्थाई रूप से जुड़ने का आग्रह किया था ।परन्तु अनजाने कारणों से ये संवाद पूरा ना हो सका । हालांकि उनकी रचनाये हंस में लगातार प्रकाशित होती रहीं । लेकिन अगर वो हंस के साथ जुड़ जाते तो उनका रचना संसार कहीं अधिक विस्तृत रूप में हमारे सामने होता । उनके अंतिम समय की रचनाओं को सहेजना वाला उनके साथ कोई नहीं था , जिसके फलस्वरूप उस दौरान रफ़ कागजों के पीछे लिखा गया हिंदी और अंग्रेजी का पूर्णतया मौलिक साहित्य अंधेरों में गुम हो गया ।
भुवनेश्वर की उपलब्ध सभी रचनाओं को आज पुनः लोगों तक पंहुचाने की आवश्यकता है । आज के साहित्यकारो को भी देखना चाहिए कि आज के परिवेश में भी कहीं अधिक प्रासंगिक भुवनेश्वर की रचनाये सर्वाधिक विपरीत परस्थितियों में कैसे परवान चढ़ीं । धन्य है रूहेलखंड की धरती जिसने भुवनेश्वर जैसे लेखक को जन्म दिया । ( आमिर खुर्शीद मलिक )

Saturday, November 1, 2014

हमारी धरोहर -- सूफी अम्बा प्रसाद

हमारी धरोहर -- सूफी अम्बा प्रसाद 
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रूहेलखंड की धरती ने आजादी के अनगिनत सपूतों को जन्म दिया । इनमे एक महत्वपूर्ण नाम सूफी अम्बा प्रसाद का भी है। अपने समय के प्रकाण्ड विद्वान, और देश प्रेम के अदभुत ज़ज्बे के कारण अंग्रेज़ सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बने अम्बा प्रसाद का कर्म क्षेत्र रूहेलखंड,पंजाब,नेपाल से लेकर बलूचिस्तान, अफ़गानिस्तान और ईरान तक फैला था । अंग्रेजों से अपनी लेखनी से लोहा लेने की बात हो ,या फिर उनके गढ़ में घुस कर जासूसी करने का जोखिम भरा काम हो , अम्बा प्रसाद को महारत हासिल थी। परन्तु आज की पीढ़ी इस विलक्षण प्रतिभा के योगदान से अनभिज्ञ है।

सूफी अम्बा प्रसाद भटनागर का जन्म 21 जनवरी 1858 को मुरादाबाद में हुआ था ।उन्होंने अपनी शिक्षा मुरादाबाद,जालंधर और बरेली में ग्रहण की। उन्होंने एम ए करने के बाद वकालत की डिग्री प्राप्त की।उनके जन्म से एक हाथ नही था ।जिसके बारे में उनका मानना था कि अंग्रेजो से 1857 में स्वतंत्रता के लिए हुई जंग में शहीद होने से पहले ही उनका ये हाथ कट गया था , पुनर्जन्म मिला , परन्तु उनका वह हाथ वापस नहीं मिला। पारसी भाषा के विद्वान अम्बा प्रसाद ने मुरादाबाद से उर्दू साप्ताहिक जाम्युल इलुक का प्रकाशन किया। इसका प्रत्येक शब्द अंग्रेज़ शासन पर प्रहार करता था। हास्य रस के महारथी अम्बा प्रसाद ने देशभक्ति से सम्बंधित अनेक विषयों पर गंभीर चिंतन भी किया।अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ इस जंग में वो हिन्दू मुस्लिम एकता के जबरदस्त हिमायती रहे ।उन्होंने अंग्रेजो की हिन्दू मुसलमानों को लड़वाने के लिए रची गई कई साजिशें अपने अखबार के जरिये बेनकाब की । कई बार जेल में असहनीय कष्ट भरे दिन (1897-1906) उन्हें गुज़ारने पड़े। उनकी सारी संपत्ति भी सरकार ने ज़ब्त कर ली ।लेकिन उन्होंने सर नहीं झुकाया। जेल से छूटने पर निजाम हैदराबाद ने उन्हें सारी सुविधाओ के साथ बसने का निमंत्रण दिया ।परन्तु उनको पता था की उनका जन्म एक बड़े मकसद के लिए हुआ है । अम्बा प्रसाद पंजाब चले गए और हिन्दुस्तान अखबार में काम करने लगे।सरदार अजीत सिंह की भारत माता सोसाइटी से जुड़ कर उन्होंने अपना काम जारी रक्खा। यहाँ पर भी अंग्रेजों की बढती घेराबंदी के कारण उन्हें अजीत सिंह के साथ नेपाल में शरण लेनी पड़ी। परन्तु उनको शरण देने के जुर्म में वहां के गवर्नर को भी पद से हटा दिया गया ,और एक बार फिर सूफी अम्बा प्रसाद को गिरफ्तार करके लाहौर लाया गया। लाला पिण्डी दास के अखबार इंडिया में प्रकाशित उनके लेखों को आपत्तिजनक मानते हुए अभियोग बना कर लगाये गए,पर सिद्ध ना हो सके। उनके द्वारा लिखी पुस्तक जब्त कर ली गई। 1909 में उन्होंने पंजाब से पेशवा अखबार का प्रकाशन शुरू किया। अब अंग्रेज़ सरकार को चिंता हुई कि यह अखबार कही पंजाब में भी बंगाल और रूहेलखंड जैसे हालात ना पैदा कर दे ।दिन-ब-दिन तेज़ होती धरपकड़ से तंग आकर अम्बा प्रसाद ने अपना नाम बदल कर सूफी मोहम्मद हुसैन रख लिया। आखिर कार उनको अपने साथियों के साथ देश छोड़ कर ईरान में शरण लेने के लिए विवश होना ही पड़ा ।लेकिन वहां भी उनका अंग्रेजो के विरुद्ध मुहिम जारी रहा। ईरान के शीराज़ में उन्होंने ग़दर पार्टी के साथ काम किया।ईरान में लिखी गई उनकी पुस्तक आबे हयात काफी चर्चा में रही ।वहां उन्होंने शिक्षा दान का अदभुत कार्य भी किया । उन्होंने मशहूर राजनयिक और शिक्षाविद डॉक्टर असग़र अली हिकमत को पढाया जो आगे चल कर ईरान की राजनीति में ही नहीं विश्व में भी एक सम्मानीय नाम बना।
अंततः अंग्रेजो ने उन्हें गिरफ्तार कर ही लिया। उनको गोली मारने का आदेश हुआ। परन्तु इससे पहले ही 21फरवरी1915 में उनका देहावसान हो गया ।शीराज़ में उनका मकबरा स्थित है। आज भी ईरान में उनका नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है ,पर अफ़सोस ........... हम अपनी क्रांति के इस महत्वपूर्ण स्तम्भ के बारे में जानते भी नही !