सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!

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AMIR KHURSHEED MALIK
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Monday, December 8, 2014

बदलापुर बॉयज : मजहर खान

उत्तरप्रदेश का छोटा सा जिला शाहजहांपुर रंगमंच और रुपहले परदे पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से नहीं चूकता ।  अपने सशक्त एवं समर्थ रंगमंच की धमक पूरे देश में बिखेरने वाले शाहजहांपुर ने मजहर खान नामक एक नया सितारा बालीवुड के हवाले किया है । जिनकी आने वाली फिल्म बदलापुर बॉयज उनके भविष्य के लिए महत्वपूर्ण साबित होने वाली है । लेखक निर्देशक शैलेश वर्मा की इस फिल्म में कबड्डी खेल से गाँव की एक बड़ी समस्सया हल करने वाले युवकों की कहानी है।  कर्म मूवीज  के बैनर तले बन रही इस फिल्म में वास्तविक ग्रामीण पृष्ठभूमि का छायांकन शैलेश वर्मा की विशेष उपलब्धि है । लेकिन आधुनिक फिल्मों के सभी नाच-गाने से लेकर रोमांस का तड़का अपनी जगह मौजूद है । ऐसे में ग्रामीण पृष्ठभूमि से जुड़े होने के बाद भी दर्शकों के लिए किसी मसाले की कमी महसूस नहीं होगी । फिल्म में कबड्डी कोच की भूमिका अन्नू कपूर निभा रहे हैं । शैलेश वर्मा के लिए भले ही बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म हो, लेकिन वो बतौर लेखक कई बड़ी फिल्मों के साथ जुड़े रह चुके हैं ।


मजहर खान इससे पहले विशाल वर्मा के निर्देशन में आदर्श नगर, राजश्री प्रोडक्शन की लव यू मिस्टर कलाकार, सहित देख इंडियन सर्कस, रज्जो, में भी काम कर चुके हैं फेस्टिवल फिल्म द कनेक्शन, संशोधन,गोल्डन पॉकेट वाच, उषा, आदि में में भी हम उनसे रूबरू हो चुके हैं ज़ी टीवी के सीरियल भागोंवाली में उनकी भूमिका टिल्लू, डोली अरमानों की में मुक्ति , चर्चा में हैं
भारतेंदु नाट्य अकादमी से नाट्य विधा में डिप्लोमा प्राप्त कर चुके मजहर खान पुणे के एफटीआईआई से प्रशिक्षित भी हैं ! (आमिर खुर्शीद मलिक )

Sunday, November 30, 2014

क्रांतिकारी साहित्य का विशिष्ठ नाम : सुधीर “विद्यार्थी”

आइये आज रूबरू होते हैं किसी ऐसे नाम से ,जिसमें देश के स्वतंत्रता संग्राम को उसके वास्तविक स्वरुप के साथ उकेरने का जूनून हो ।  जो सफल नाटककार हो, अभिनेता, लेखक,कवि जैसे अनगिनत नैसर्गिक तमगे उसमें अपने विशिष्ठ स्वरुप में विराजमान हों ।  यकीनन ऐसे विलक्षण पैमाने पर सुधीर “विद्यार्थी” जैसा नाम ही सटीक बैठता है । क्रांतिकारी साहित्य से अलख जगाने वाला यह लेखक श्रमिक आन्दोलन से लेकर सामाजिक मुद्दों पर भी अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए जाना जाता है ।  “भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का सही मूल्यांकन नहीं हुआ है” ऐसा मानने वाले सुधीर “विद्यार्थी” ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की परतों को ज़मीनी स्तर पर जा कर ढूंढा है पैदल यात्रा हो या साइकिल से दूर दराज़ के क्षेत्र में खोजबीन , सुधीर “विद्यार्थी” नें कोई कसर नहीं छोड़ी । यही कारण है कि क्रांतिकारी साहित्य में उनकी खोज और कृतित्व अपना बेमिसाल स्थान रखते हैं । इन किताबों और लेखों से शहीदों की दुर्लभ जानकारियाँ लोगों तक पहुँच पाई । शहीदों के परिवारों तक पहुँच कर उनको आर्थिक सहायता और सही पहचान दिलवाने में भी उनके प्रयास अनूठे रहे हैं । यकीनन इन सबके लिए जिस इन्क़लाबी तेवरों की ज़रूरत होती है , वह सुधीर “विद्यार्थी” के अन्दर हैं ।


1 अक्टूबर 1953 को जन्में सुधीर “विद्यार्थी” का पूरा जीवन भारत की क्रांति गाथा को समर्पित रहा । सुधीर “विद्यार्थी” नें अशफाकउल्ला, रोशन सिंह , भगत सिंह , मौलवी अहमदुल्लाह शाह,बटुकेश्वर दत्त और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे कई शहीदों और क्रांतिकारियों पर दर्जनों किताबे लिखीं हैं । उनके कृतित्व में क्रांतिकारी विरासत को सच्चाई को अगली पीढ़ी तक सही रूप में पहुचाने का जुनून साफ़ नज़र आता है । उनकी प्रमुख कृतियों में अशफाकउल्ला और उनका युग, शहीद रोशन सिंह ,उत्सर्ग,भगत सिंह की सुनें, आमादेर विप्लवी, शहीद मौलवी अहमदुल्लाह शाह,काला पानी का ऐतिहासिक दस्तावेज़,अग्निपुंज जैसे अनगिनत नाम शामिल है । अपराजेय योद्दा कुंवर भगवान सिंह,मेरा राजहंस,शहीदों के हमसफ़र,गदर पार्टी से भगतसिंह,  क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त,आज का भारत और भगतसिंह, क्रांति की इबारतें आदि से उनको काफी चर्चा मिली । एनसीआरटी की कक्षा 11 की पुस्तक साहित्य मञ्जूषा में क्रांति की प्रतिमूर्ति : दुर्गा भाभी, तथा कक्षा 5 में शहीद रोशन सिंह लेख पाठ्यक्रम में सम्मिलित किये गए हैं । विभिन्न विश्वविद्यालयों में क्रांतिकारी आन्दोलन पर उनके व्याख्यान सराहे जा चुके हैं । शाहजहांपुर में शहीद रामप्रसाद बिस्मिल,रोशनसिंह, अशफाक़उल्ला खां, मौलवी अहमदुल्लाह शाह के स्मारकों के निर्माण के लिए उनके प्रयास हम सब जानते हैं।  बीसलपुर में शहीद चंद्रशेखर आज़ाद की प्रतिमा और पार्क का निर्माण,  बरेली में क्रांतिकारी दामोदर स्वरुप सेठ एवं ठाकुर पृथ्वी सिंह उद्यान का निर्माण उनके संघर्ष की उपलब्धियों में शामिल हैं । 1979 में शाहजहांपुर में अखिल भारतीय क्रांतिकारी सम्मलेन उनके इस संघर्ष की नीव मानी जा सकती है।  उन्होंने 1981 में समाचारपत्र “साथी” के चंद्रशेखर आज़ाद विशेषांक, साहित्यिक पत्रिका “संदर्श”, में संपादन में भी अपने जौहर दिखाए हैं । उनका एक अलग पहलू अभिनय भी है । उन्होंने लगातार 20 वर्षों तक नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से समाज के हर तबके से सीधे संवाद स्थापित किया है।  शाहजहांपुर की नाट्य संस्था “विमर्श” के वह अध्यक्ष भी रहे ।
क्रांतिकारी आन्दोलन के इतिहास लेखन के लिए उन्हें 1997 का “परिवेश सम्मान” और 2013 का “गणमित्र सम्मान” दिया गया । उनको लेखन के लिए “शमशेर सम्मान” और “अयोध्या प्रसाद खत्री सम्मान” मिला ।  उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर रूहेलखंड विश्वविद्यालय में शोध प्रबंध किया जा चूका है । कविता भारत के सम्पादन में उन पर केन्द्रित एक पुस्तक “ जमीन को देखती आँखें” प्रकाशित हो चुकी है । हम सब उनकी आने वाली पुस्तकों “क्रान्ति की ज़मीन पर” , “भगत सिंह : एक विमर्श” ,”क्रांतिकारी आन्दोलन : एक पुनर्पाठ” का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं।  जिनमें यकीनन इतिहास के कुछ अनखुले पन्नो से हम रुबरू हो सकेंगें ।  




Monday, November 24, 2014

दक्षिण भारतीय फिल्मों का अनोखा खलनायक : अदीब नज़ीर

अदीब नज़ीर , दक्षिण भारतीय फिल्मों और रंग मंच का वो नाम है जिसका जूनून और समर्पण , उसको औरों से अलग कर देता है ! अपनी स्थापित दिनचर्या को ठुकरा कर अपने सपने को पूरा करने को आगे बढे अदीब नाज़िर का जन्म दक्षिण भारत के वारंगल (तेलांगना राज्य) में हुआ था ! यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस के डिवीज़नल मैनेजर के पद को समय से पहले अलविदा कहके रंगमंच और फिल्मों के लिए पूरा समय देने के फैसले के बाद अदीब नाज़िर का हुनर पूरे निखार पर आ गया !
लगभग 15 तेलगु फिल्मों में खलनायक का रोल करने वाले अदीब नज़ीर   असल ज़िन्दगी में बहुत अच्छे इंसान हैं ! वर्तमान में हैदराबाद के निवासी अदीब की पहली हिंदी फिल्म प्यासी नागिन(1994) थी ! फिल्मों की चमक भरी दुनिया के बाद भी रंगमंच के लिए उनकी प्राथमिकतायें सर्वोपरि रहती हैं ! सामाजिक मुद्दों पर लगातार सांस्कृतिक कार्यक्रम उनकी प्राथमिकता रहती है ! स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के  सम्मान से जुड़े मुद्दे हों , या फिर भूख से बिलखते किसान ! दहेज़ हत्या के विरुद्ध अलख जगाने का मुहिम हो , या फिर देश की सीमा पर शहीद हुए वीरों के परिवार के सहायतार्थ फ़िल्मी सितारों का कोई आयोजन , अदीब नज़ीर हर जगह पूरी तन्मयता से लगे रहते हैं !

अपनी पहली तेलगु फिल्म Mantrala Marri Chettu में मुख्य खलनायक की भूमिका निभाने वाले अदीब समाज में बिखराव को लेकर चिंतित हैं ! अपने 20 वर्ष के फ़िल्मी अनुभव को लेकर अब उन्होंने अपनी कहानी को लेकर निर्देशन करने की ठानी है !

परिंदा आर्ट्स इन्टरनेशनल फिल्म्स के बैनर तले उनकी अगली तेलगु फिल्म Prema Gelupu Kosame Ghani. ..Gaadse Kaadu की तैय्यारी जोर-शोर से चल रही है ! इस फिल्म में सामाजिक ताने बाने में अलगाव का दंश झेल रहे लोगो के लिए एक अच्छा सन्देश है ! अदीब अपनी फिल्म को औरतों पर हो रहे जुर्म के खिलाफ भी हथियार बनाना चाहते हैं ! लेकिन उनकी चिंता साम्प्रदायिकता को लेकर आ रहे अलगाव को लेकर भी कम नहीं है ! वो अपनी फिल्म को हम सब एक हैं का सन्देश देने के लिए सामने लाना चाहते हैं ! उनके साथ इस फिल्म में नमिता , शफी , बैनर्जी , जीवा , ब्रह्मानंद , सुनील,नरेंद्र,पुविषा,हरिका,लक्ष्मन,चिनी,और रवि आदि भूमिका निभा रहे हैं !
(आमिर खुर्शीद मलिक) 

Saturday, November 22, 2014

शाहजहांपुर रंगकर्म की नीव : चंद्रमोहन महेन्द्रू

शाहजहांपुर की रंगयात्रा की नींव के पत्थरों में से एक उल्लेखनीय नाम चंद्रमोहन महेन्द्रू का है ! जनपद में रामलीला के नायाब मंचन हों , या फिर पारसी रंगमंच से प्रभावित ऐतिहासिक नाटकों का दौर ! आधुनिक रंगमंच के तकनीकी पक्षों से सजे-संवरे सामाजिक नाटको का मंचन हो , या फिर राष्ट्रीय स्तर पर शाहजहांपुर के समर्द्ध रंगमंच की पताका फहराने की बात हो , चंद्रमोहन महेन्द्रू का नाम हर जगह ऊँचाइयों पर रहा !

चंद्रमोहन महेन्द्रू का जन्म 19 नवम्बर 1944 को पाकिस्तान में एक पंजाबी क्षत्रिय परिवार में हुआ ! उनका परिवार बंटवारे के बाद देहरादून,लुधियाना होता हुआ 1955 में शाहजहांपुर आ गया ! चंद्रमोहन महेन्द्रू को रंगकर्म विरासत में मिला था ! उनके पिता स्वर्गीय चमन लाल महेन्द्रू एक अच्छे रंगकर्मी और गायक थे ! उनसे मिली प्रेरणा और प्रोत्साहन की बदौलत चंद्रमोहन महेन्द्रू का रुझान धीरे-धीरे रंगकर्म की ओर बढ़ता चला गया ! आर्थिक झंझावातों नें उनकी राह रोकी , पर उनका यह जूनून समय के साथ बढ़ता चला गया ! अपनी पढाई के दौरान ही उन्हें सिकंदर और पोरस नाटक में अभिनय का मौका मिला ! यह उनके रंगमंच का पहला पडाव था ! 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान ऑर्डिनेंस क्लोदींग फैक्ट्री में भर्ती होने का मौका मिला , जिससे परिवार के हालात सुधारने के साथ-साथ रंगमंच से प्रभावी तरीके से जुड़ने का मौका भी जय नाट्यम संस्था के मार्फ़त उन्हें मिल गया !

इसी दौरान शाहजहांपुर में नाटको की सफलता से उत्साहित होकर ऑर्डिनेंस ड्रामेटिक क्लब का गठन किया गया  ! जिसमें चंद्रमोहन महेन्द्रू को अपनी प्रतिभा दिखने का मौका मिला ! 1971 में चंद्रमोहन महेन्द्रू को ऑर्डिनेंस ड्रामेटिक क्लब की रामलीला में प्रवेश मिल गया ! उन्होंने रामलीला में रावण,परशुराम,दशरथ जैसी चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं उन्होंने निभाई ! इस बीच उनका जुडाव जय नाट्यम संस्था से बना रहा ! इसी दौरान शाहजहांपुर के रंगमंच में क्रांतिकारी बदलाव आया ! आधुनिक रंगमंच ने शाहजहांपुर में दस्तक दी ! साहित्यिक संस्था अनामिका नें नाट्य क्षेत्र में पदार्पण किया ! भोपाल के नाट्य निर्देशक कमल वशिष्ठ ने आधुनिक रंगमंच की बारीकियों को एक वर्कशॉप के द्वारा समझाया ! तत्पश्चात असग़र वजाहत के नाटक इन्ना की आवाज का मंचन भी किया गया ! इस मंचन में चंद्रमोहन महेन्द्रू की प्रतिभा का बेहतरीन पक्ष सामने उभर कर आया  ! इसी दौरान चेखव की कहानी गिरगिट का भी मंचन किया गया ! 1984 में आयोजित एक और वर्कशॉप में अमरेन्द्र सहाय अमर ने नाटक कोणार्क को तैयार कराया , जिसकी केन्द्रीय भूमिका के लिए चंद्रमोहन महेन्द्रू को चुना गया ! उन्होंने अपने पात्र के साथ पूरा न्याय किया ! इस नाटक के बाद में कई मंचन भी हुए ! 1985 में एक था गधा उर्फ़ अलादाद खान में भी उनकी भूमिका प्रशंसा का विषय बनी !


1986 में बनी कोरोनेशन के संस्थापक ज़रीफ़ मलिक आनंद नें अपनी पहली प्रस्तुति प्रमोशन के निर्देशन का दायित्व चंद्रमोहन महेन्द्रू को ही सौंपा ! निर्देशन से जुड़ने के बाद उन्होंने जनता पागल हो गई है, छत पुरानी , सिंहासन खाली है आदि कई प्रमुख प्रस्तुतियों को निर्देशन से सवारा !उन्होंने टेलीफिल्म सलाहमें भी काम किया ! 1989 में संस्कृति पर फासीवादी हमले के विरुद्ध हुए प्रदर्शनों में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही !

शाहजहांपुर में नुक्कड़ नाटक को लाने और निर्देशन का सौभाग्य चंद्रमोहन महेन्द्रू को ही मिला ! 1989 में जसम के बैनर तले जागो-जागो के तीन मंचन एक उदाहरण बन गए !राजेश कुमार लिखित नुक्कड़ नाटक हमें बोलने दो ,महेश सक्सेना द्वारा लिखित नाटक दिशा ,सर्वेश्वर दयाल शर्मा रचित बकरी, में उन्होंने निर्देशन किया ! बकरी को अखिल भारतीय नाटक प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी मिला ! राजेश कुमार के साथ उन्होंने आखिरी सलाम का संयुक्त निर्देशन किया !प्रेमचंद की पूस की रात के  अपने निर्देशन में रौनक अली के अभिनय से संवरे 50 शो कराये , जोकि अपने आप में एक कीर्तिमान बन गया ! 2005 में भुवनेश्वर के नाटक सिकंदर का निर्देशन,चंद्रमोहन दिनेश की कहानी एक दा विकास खंडे का नाट्य रूपांतरण और निर्देशन ,मीरा कान्त के नाटक भुवनेश्वर दर भुवनेश्वर का निर्देशन उनकी विशिष्ठ उपलब्धि रही ! इसके अलावा भी ढेरों नाटकों और प्रस्तुतियों में वह भागीदार रहे हैं ! 
 चंद्रमोहन
महेन्द्रू को 1998 में जनपद रत्न से सम्मानित किया गया !इसके अतिरिक्त उन्हें परिक्रमा,संकल्प,गांधी पुस्तकालय, ऑर्डिनेंस ड्रामेटिक क्लब,संस्कृति एकता मंच,द्वारा भी सम्मानित किया गया ! उनको गांगुली स्मृति सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला ! राष्ट्रीय साहित्य कला संस्थान द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया गया ! मशहूर फ़िल्मी कलाकार राजपाल यादव ने भी उनके नाटक में काम किया है !चंद्रमोहन महेन्द्रू की रंग यात्रा को कुछ शब्दों में समेटना मुश्किल है !  शाहजहांपुर का रंगकर्म उनके बहुमूल्य योगदान का गवाह है !