अच्छाइयां
अनगिनत हैं , तो बुराइयाँ भी अनंत हैं। आप कहाँ तक तिकड़मी हिसाब में उलझियेगा। आप
तो बस यह तय कर लीजिये कि आपको क्या चाहिए ? आप सकारात्मकता बटोरते चलिए, या फिर
नकारात्मकता में फिसलते रहिये। यह आभासी दुनिया भी हमारी चिरपरिचित असली दुनिया से
कुछ बहुत अलग नहीं बन सकती। ऐसे में यह नियम यहाँ भी लागू होता है। जिस तरह यहाँ
पर अपनी अच्छाइयों का ढिंढोरा पीटने का चलन जोरो पर है ,उसी तरह अपनी
बुराइयों को चाहे-अनचाहे बयाँ कर जाने की मजबूरी भी चलन में है। अपने को उच्चतर
साबित करते-करते निम्नतर स्तर पर उतरने की होड़ सी लगी है । “हम ही सही हैं” ऐसा सुनने की
आदत डाल लीजिये । या फिर “बहुत कुछ गलत” सुनने को तैयार
हो जाइये । अपनी
आवाज़ बुलंद करने को सोशल मीडिया ने मंच तो दिया , कुछ अच्छी आवाजें भी उठी , सुन
कर अच्छा लगा । लेकिन बहुतायत सुनने और समझने में अटपटी ही नज़र आई । एक बात अक्सर ही
हम अपने बड़े-बुजुर्गों से सुनते आये हैं कि यह दुनिया , कुछ अच्छे लोगों की ही
बदौलत क़यामत से महफूज़ है । जिस दिन यह चुनिन्दा अच्छे लोग “अलविदा” कह देंगे , यह
दुनिया “प्रलय” की गिरफ्त में होगी । पता नहीं क्यों , लेकिन
इस आभासी दुनिया के लिए भी मुझे यही “भ्रम” पाल लेने का मन
करता है । बस यह “कुछ” अच्छी आवाज़े इस आभासी दुनिया को बचाए हुए हैं
, वरना यह सब कुछ ख़त्म हो चुका होता । यह “भ्रम” पालने का “भ्रम” कितना उचित है
या कितना अनुचित , यह तो मै नहीं जानता । लेकिन दिल को बहलाने को तो ग़ालिब यह
ख्याल अच्छा ही है । अच्छे की तलाश में लगे सभी अग्रजों की जय हो !
सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!
AMIR KHURSHEED MALIK
Friday, February 19, 2016
Monday, February 15, 2016
हवा बिकती है , बोलो ......खरीदोगे ?
कुछ चीज़ें हमको प्रकृति ने बिलकुल मुफ्त , दिल खोल कर दी है । लेकिन हमने अपने
अप्राकृतिक व्यवहार से इनको भी अपनी पहुँच से दूर कर दिया है । हवा-पानी कुदरत की
एक अनमोल देन है । जिसके बिना हमारे अस्तित्व की कल्पना ही बेमायने है । लेकिन
मनुष्य ने अपने जायज़-नाजायज़ क्रियाकलाप से इन दोनों का अंधाधुंध दोहन ही नहीं किया
, अपने आज के व्यवसायिक हित को साधने के लिए हम सबके कल को भयावह स्थिति में
पहुंचा दिया है। महानगरो से लेकर सुदूर गाँव तक हम पानी की कमी का सामना कर रहे
हैं । सिमटते पोखर-तालाब से पानी तो गायब हुआ ही , बोतलबंद पानी की ‘नाजायज़ जरुरत’
एक ‘बड़ी ज़रूरत’ बनती चली गई । आज हम कुदरत की अनमोल लेकिन मुफ्त सौगात पानी खरीदने
को “स्वास्थ्य जागरूकता” या फिर “लाइफस्टाइल” मान कर स्वीकार कर चुके हैं । हमारे इस समर्पण ने हमारे सामने अगली चुनौती की
भूमिका बांधनी शुरू कर दी है । दुनिया के एक कोने से “हवा” बेचने की बहुत छोटी सी खबर आई । इतनी छोटी की हम सब उसको नज़र अंदाज़ कर गए ।
यहाँ पर ध्यान देने की बात यह है कि चाइना के उस शहर में में प्रदुषण का स्तर
हमारे अपने देश की राजधानी से लगभग आधा है । ऐसे में जिस खतरनाक स्थिति की ओर हम
बढ़ रहे हैं , उसकी कल्पना भी मुश्किल है । “पानी” के बढ़ते बाज़ार के बीच आने वाला कल कहीं “हवा” के संभावित बाज़ार की दस्तक तो नहीं दे रहा । जैसा कि साफ़ दिख रहा है कि पानी के मसले पर हम आज तक
नहीं संभल पाए । ऐसे में “हवा” के बारे में इस हलकी “सरसराहट” को भी हम यकीनन “हवा” में ही उड़ायेंगे । होना भी चाहिए , आखिर हम प्रगति की ओर अग्रसर हैं ।
प्रकृति का वजूद हम उस हद तक नकारेंगे , जब तक प्रकृति हमको पूरी तरह नकार नहीं
देती । नकारने की पराकाष्ठा का हमारा-आपका यह इंतज़ार शायद प्रलय की आहट के साथ
ख़त्म होगा । इसलिए आईये जब तक तो जश्न
मनाएं , या फिर कुछ सुधरने-सुधारने के लिए जुट जाएँ ।
Sunday, January 31, 2016
एक ऐसा करिश्माई व्यक्तित्व
एक ऐसा करिश्माई व्यक्तित्व , जिसने एक मुट्ठी भर नमक उठाकर स्थापित
साम्राज्यवाद को चुनौती देने का काम कर दिया । एक ऐसा अग्रज जिसके हर
आन्दोलन, जन आन्दोलन बन गए । एक ऐसा महात्मा जिसने अपनी मज़बूत आवाज़ भी
शान्ति से बुलंद की । ऐसे ही थे हमारे "बापू" , जिन्होंने किसी दूसरे को
सलाह देने से पहले उसका प्रयोग स्वंय पर किया । उन्होंने बड़ी से बड़ी मुसीबत
में भी अहिंसा का मार्ग नहीं छोङा। आज दुनिया उनको सत्य और अहिंसा के
महानायक के रूप में पहचानती है । भारत की आज़ादी में उनके महती योगदान को
अनदेखा नहीं किया जा सकता । गाँधी जी सादा जीवन उच्च विचार के समर्थक थे,
और इसे वे पूरी तरह अपने जीवन में लागू भी करते थे। उनके सम्पूर्णं जीवन
में उनके इसी विचार की छवि प्रतिबिम्बित होती है। यहीं कारण है कि उन्हें
1944 में नेताजी सुभाष चन्द्र ने राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित किया था। आज
हमारे बीच गांधी जी नहीं हैं । लेकिन "बापू" के विचार देश-दुनिया में
अपनी जगह बना चुके हैं । अधिकतर उनको और उनके विचार के महत्व को
जानते-मानते हैं । वहीँ कुछ नें उनके विरोध को ही उनके विचारों से लड़ने का
रास्ता समझ लिया है । वो अपनों के लिए गैरों से लड़े , गैर उनके सम्मान में
अपने मुल्कों में स्मारक बनवा रहे हैं । अपने , अपने ही देश में बने
स्मारकों और विचारों को नुकसान पहुँचाने में व्यस्त हैं ।
यह पहला अवसर नहीं था जब उनकी उपेक्षा की जा रही है , इतिहास में ऐसे अनेक अवसर आए थे, जब गांधीजी को अकेले छोड़ दिया गया । लेकिन अपनी शांतिपूर्ण वैचारिक दृढ़ता के कारण उन्होंने हर विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को पहले से ज्यादा मजबूती से स्थापित किया । वह अपने विचारों से कभी कोई समझौता नहीं करते थे । अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को उन्होंने सदैव तरजीह दी । जो आज भी उनके विचारधारा के रूप में जिंदा हैं । इसके लिए उन्हें निश्चित ही बड़ा संघर्ष करना पड़ा होगा - पहले अपने से और फिर परिवार से और बाद में समाज से । अफ़सोस यह संघर्ष आज भी जारी है । विनम्र श्रदांजलि ।
यह पहला अवसर नहीं था जब उनकी उपेक्षा की जा रही है , इतिहास में ऐसे अनेक अवसर आए थे, जब गांधीजी को अकेले छोड़ दिया गया । लेकिन अपनी शांतिपूर्ण वैचारिक दृढ़ता के कारण उन्होंने हर विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को पहले से ज्यादा मजबूती से स्थापित किया । वह अपने विचारों से कभी कोई समझौता नहीं करते थे । अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को उन्होंने सदैव तरजीह दी । जो आज भी उनके विचारधारा के रूप में जिंदा हैं । इसके लिए उन्हें निश्चित ही बड़ा संघर्ष करना पड़ा होगा - पहले अपने से और फिर परिवार से और बाद में समाज से । अफ़सोस यह संघर्ष आज भी जारी है । विनम्र श्रदांजलि ।
Friday, January 15, 2016
धर्म के स्वघोषित झंडाबरदार
ना चाहते हुए भी आज एक सवाल पूछने से अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ । क्या धर्म की आड़ में हमको कानून तोड़ने की गुप-चुप इज़ाज़त हासिल है ? सवाल अटपटा जरुर लगता है , लेकिन अगर नज़र दौडाएं तो हमको इसमें कडवी सच्चाई नज़र आती है ।धार्मिक जुलूसों में दौड़ते दुपहिया वाहनों पर तीन से लेकर चार तक तो समाने की कोशिश हो, या फिर सड़क पर रास्ता बंद करके होते धार्मिक आयोजन हों , कानून की खिल्ली सरेआम कानून के रखवालों के सामने ही उडती नज़र आती है। इसके साथ ही इन तथाकथित धार्मिकों के चेहरे पर पुलिसिया डंडे को परास्त कर देने का एक अनूठा दंभ भी अक्सर ही नज़र आता है । कई बार यह उन्मादित आचरण दुर्घटनाओं का कारण भी बनते है ।
अवैध क़ब्ज़ा करके दिन ब दिन पनपते आस्था के केन्द्रों की बढती संख्या भी उन परम धार्मिक चेहरों के लिए सवाल ही खड़ा करती हैं । यह लोग धर्म के नाम पर अपनी जान देने का तो दावा कर जाते हैं , पर अपनी आस्था के केंद्र के लिए अपनी निज़ी जगह दान करने को तैयार नहीं होते । शायद हम सबने मान लिया है कि इसके लिए सरकारी जगह पर क़ब्ज़ा ही न्यायोचित तरीका है उदाहरण ढेरों हैं , लेकिन यहाँ पर सिर्फ मूल भावना तक पहुँचने के लिए इन उदाहरणों का ज़िक्र किया गया है ।
अगर बात घर्म की चलती है तो यह मान के चला जाता है कि यह हम सबको सही रास्ते पर चलने की राह दिखाएगा । ऐसे में जब उसकी ही आड़ में बेशर्मी के साथ कानून का उल्लंघन होता नज़र आता है । तब यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि, क्या धर्म कानून के कायदे से अलग किसी प्रथा का समर्थन करता है ? या फिर
धर्म के स्वघोषित झंडाबरदार ही इस परिस्थिति के ज़िम्मेदार हैं ?
अवैध क़ब्ज़ा करके दिन ब दिन पनपते आस्था के केन्द्रों की बढती संख्या भी उन परम धार्मिक चेहरों के लिए सवाल ही खड़ा करती हैं । यह लोग धर्म के नाम पर अपनी जान देने का तो दावा कर जाते हैं , पर अपनी आस्था के केंद्र के लिए अपनी निज़ी जगह दान करने को तैयार नहीं होते । शायद हम सबने मान लिया है कि इसके लिए सरकारी जगह पर क़ब्ज़ा ही न्यायोचित तरीका है उदाहरण ढेरों हैं , लेकिन यहाँ पर सिर्फ मूल भावना तक पहुँचने के लिए इन उदाहरणों का ज़िक्र किया गया है ।
अगर बात घर्म की चलती है तो यह मान के चला जाता है कि यह हम सबको सही रास्ते पर चलने की राह दिखाएगा । ऐसे में जब उसकी ही आड़ में बेशर्मी के साथ कानून का उल्लंघन होता नज़र आता है । तब यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि, क्या धर्म कानून के कायदे से अलग किसी प्रथा का समर्थन करता है ? या फिर
धर्म के स्वघोषित झंडाबरदार ही इस परिस्थिति के ज़िम्मेदार हैं ?
Saturday, December 12, 2015
सच
सच की ही जीत होती है !
देर से ही सही ,
इन्साफ होता जरुर है !
क्या अब भी आप यही रटते रहेंगे ?
अरे , अब तो मान लीजिये !
जुर्म भी "अमीर" और" गरीब" होता है !
खैर जाने भी दीजिये जनाब !
आइये "पतंग" उड़ाते हैं !
क्या पता कल यही काम आ जाए !
देर से ही सही ,
इन्साफ होता जरुर है !
क्या अब भी आप यही रटते रहेंगे ?
अरे , अब तो मान लीजिये !
जुर्म भी "अमीर" और" गरीब" होता है !
खैर जाने भी दीजिये जनाब !
आइये "पतंग" उड़ाते हैं !
क्या पता कल यही काम आ जाए !
Tuesday, September 8, 2015
इंसानियत को विनम्र श्रदांजलि !
कुछ हादसे "सुर्खियाँ"
में जरुर आ जाते हैं ! लेकिन
इस का मतलब यह नहीं है कि बस यही हादसा पूरी सच्चाई है ! दिल्ली का निर्भया काण्ड लोगों
बहुतों को विचलित कर गया ! लेकिन यह देश का पहला और आख़िरी बलात्कार काण्ड नहीं
था ! उसके पहले और बाद में भी यह वीभत्सता बदस्तूर जारी है ! सीरिया के मासूम का मौत
के आगोश में सो जाना भी कोई पहला और आखरी मामला नहीं है ! मासूमों और निर्दोषों को
अपने निहित स्वार्थों के लिए बलि चढाने का यह यह अमानवीय कृत्य दुनिया के कई देशों
में बदस्तूर जारी है ! हाल-बहरहाल एक दुखद घटना से ही सही, हम सब जागे तो हैं ! लेकिन
यकीन मानिए, हम सब जल्दी ही सो जायेंगे !
इसके बाद जो कुछ जैसा चलता आया है , चल रहा है , चलता रहेगा !
इंसानियत को विनम्र श्रदांजलि !
इसके बाद जो कुछ जैसा चलता आया है , चल रहा है , चलता रहेगा !
इंसानियत को विनम्र श्रदांजलि !
Tuesday, September 1, 2015
please stop !
भारत से करीब पौने तीन हजार मील दूर सैकड़ों मासूमों और हजारों निर्दोषों के
खून से लाल हो चुकी गाज़ा की धरती पर इजरायल का कहर अभी जारी है । दुनिया के तीन
बड़े धर्मों की आस्था की धरती आज अधर्म और दरिंदगी की नई इबारत लिख रही है । पश्चिम
एशिया का कुरुक्षेत्र बन चुकी गाजा पट्टी से दिल दहला देने वाली तस्वीरें आ रही
हैं। पूरे विश्व में विरोध प्रदर्शन जारी हैं । पर इजरायल और उसके पैरोकारों पर
कोई असर नहीं हो रहा है । उधर यूएनओ की तरफ से भी निंदा प्रस्ताव से आगे बात नहीं
बढ़ पाई है । पडोसी देश इराक़ में भी आइएसआइएस और इराक़ सरकार के बीच जारी युद्ध में
निर्दोषों के मरने का क्रम जारी है । और दुनिया के सामने वीभत्स चित्र लगातार लाये
जा रहे हैं । मानवता पूरे विश्व से दखलंदाज़ी की अपेक्षा रखती है । पर विश्व का कोई
भी देश अभी तक इस नरसंहार को रोकने के लिए आगे नहीं आया है ।
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