सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!

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AMIR KHURSHEED MALIK
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Tuesday, September 8, 2015

इंसानियत को विनम्र श्रदांजलि !

कुछ हादसे "सुर्खियाँ" में जरुर आ जाते हैं  !  लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि बस यही हादसा पूरी सच्चाई है ! दिल्ली का निर्भया काण्ड लोगों बहुतों को विचलित कर गया !  लेकिन यह देश का पहला और आख़िरी बलात्कार काण्ड नहीं था ! उसके पहले और बाद में भी यह वीभत्सता बदस्तूर जारी है ! सीरिया के मासूम का मौत के आगोश में सो जाना भी कोई पहला और आखरी मामला नहीं है ! मासूमों और निर्दोषों को अपने निहित स्वार्थों के लिए बलि चढाने का यह यह अमानवीय कृत्य दुनिया के कई देशों में बदस्तूर जारी है ! हाल-बहरहाल एक दुखद घटना से ही सही, हम सब जागे तो हैं ! लेकिन यकीन मानिए, हम सब जल्दी ही सो जायेंगे !
इसके बाद जो कुछ जैसा चलता आया है
, चल रहा है , चलता रहेगा !
इंसानियत को विनम्र श्रदांजलि !   

Saturday, July 4, 2015

आतंकवाद - एक बड़ी समस्या

विश्व के सामने आतंकवाद एक बड़ी समस्या बन कर आ खड़ा हुआ है । विश्व अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा आतंकवाद को फैलाने और रोकने के नाम पर खर्च होता है । अनगिनत निर्दोषों की हत्या और बहुमूल्य संपत्ति का नुकसान मात्र राजनितिक बयानबाजियों के बाद भुला दिया जाता है । दावे अनगिनत किये जाते हैं, पर वास्तविकता यही है की असल समस्या दिन ब दिन विकराल रूप धारण करके हमारे सामने मौजूद है । इससे निज़ात पाने का न तो अब तक आत्मबल जुटा पाये हैं, और न ही पूरी शक्ति से इस कुचक्र को कुचलने को कोई रणनीति ही बना पाये हैं। प्रत्येक आतंकी घटना की पुनरावृति के बाद हमारे शासक उन्हीं घिसे-पिटे शब्दबाणों से प्रहार करते हैं,  जैसे यह भी रस्म अदायगी का एक आवश्यक उपक्रम भर रह गया है। जिस अमेरिका ने कभी मजहबी आतंकवाद को रूस के खिलाफ इस्तेमाल किया और इसे संरक्षण भी दिया था। वो खुद उसी आतंकवाद का शिकार हुआ। मजहब आधारित आतंकवाद के खिलाफ अभियान में अमेरिका को खरबों डॉलर झोंकना पड़ा। ओसामा बिन लादेन का सफाया करने में सफलता जरूर मिली, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ खरबों डॉलर झोंकने से एक खतरनाक स्थिति यह पैदा हुई , कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई। आज इस अमेरिकी गलती को आज सारा विश्व भुगत रहा है । भारत के लिए यह मामला कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण हो जाता है । भारत से लगे देशों में आतंकवाद की फसल दिन दुनी – रात चौगुनी तरक्की कर रही है । सूचनाओ को इकठ्ठा करने की लम्बी चौड़ी कवायद के बाद भी हम हादसों को रोक नही पा रहे हैं ।

Tuesday, February 24, 2015

आतंकवाद

आज भले ही हम कुछ गिने-चुने आतंकवादियों को हिरासत में लेते हुए आतंक के मॉड्यूल का खुलासा करने में सक्षम हो रहे हों, लेकिन इन्हें रोक पाने में अभी भी हम अक्षम ही हैं। खुफिया सूचनाओं के समुचित कार्यान्वयन के अभाव में आज भी हम देश में आतंकी घटनाओं को रोक नहीं पा रहे हैं।

आतंकवाद - अनसुलझी पहेली

विश्व के सामने आतंकवाद एक बड़ी समस्या बन कर आ खड़ा हुआ है । विश्व अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा आतंकवाद को फैलाने और रोकने के नाम पर खर्च होता है । अनगिनत निर्दोषों की हत्या और बहुमूल्य संपत्ति का नुकसान मात्र राजनितिक बयानबाजियों के बाद भुला दिया जाता है । दावे अनगिनत किये जाते हैं, पर वास्तविकता यही है की असल समस्या दिन ब दिन विकराल रूप धारण करके हमारे सामने मौजूद है । इससे निज़ात पाने का न तो अब तक आत्मबल जुटा पाये हैं, और न ही पूरी शक्ति से इस कुचक्र को कुचलने को कोई रणनीति ही बना पाये हैं। प्रत्येक आतंकी घटना की पुनरावृति के बाद हमारे शासक उन्हीं घिसे-पिटे शब्दबाणों से प्रहार करते हैं,  जैसे यह भी रस्म अदायगी का एक आवश्यक उपक्रम भर रह गया है। जिस अमेरिका ने कभी मजहबी आतंकवाद को रूस के खिलाफ इस्तेमाल किया और इसे संरक्षण भी दिया था। वो खुद उसी आतंकवाद का शिकार हुआ। मजहब आधारित आतंकवाद के खिलाफ अभियान में अमेरिका को खरबों डॉलर झोंकना पड़ा। ओसामा बिन लादेन का सफाया करने में सफलता जरूर मिली, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ खरबों डॉलर झोंकने से एक खतरनाक स्थिति यह पैदा हुई , कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई। आज इस अमेरिकी गलती को आज सारा विश्व भुगत रहा है । भारत के लिए यह मामला कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण हो जाता है । भारत से लगे देशों में आतंकवाद की फसल दिन दुनी – रात चौगुनी तरक्की कर रही है । सूचनाओ को इकठ्ठा करने की लम्बी चौड़ी कवायद के बाद भी हम हादसों को रोक नही पा रहे हैं ।

Tuesday, February 17, 2015

आतंकवाद : एक बड़ी समस्या

विश्व के सामने आतंकवाद एक बड़ी समस्या बन कर आ खड़ा हुआ है । विश्व अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा आतंकवाद को फैलाने और रोकने के नाम पर खर्च होता है । अनगिनत निर्दोषों की हत्या और बहुमूल्य संपत्ति का नुकसान मात्र राजनितिक बयानबाजियों के बाद भुला दिया जाता है । दावे अनगिनत किये जाते हैं, पर वास्तविकता यही है की असल समस्या दिन ब दिन विकराल रूप धारण करके हमारे सामने मौजूद है । इससे निज़ात पाने का न तो अब तक आत्मबल जुटा पाये हैं, और न ही पूरी शक्ति से इस कुचक्र को कुचलने को कोई रणनीति ही बना पाये हैं। प्रत्येक आतंकी घटना की पुनरावृति के बाद हमारे शासक उन्हीं घिसे-पिटे शब्दबाणों से प्रहार करते हैं,  जैसे यह भी रस्म अदायगी का एक आवश्यक उपक्रम भर रह गया है। जिस अमेरिका ने कभी मजहबी आतंकवाद को रूस के खिलाफ इस्तेमाल किया और इसे संरक्षण भी दिया था। वो खुद उसी आतंकवाद का शिकार हुआ। मजहब आधारित आतंकवाद के खिलाफ अभियान में अमेरिका को खरबों डॉलर झोंकना पड़ा। ओसामा बिन लादेन का सफाया करने में सफलता जरूर मिली, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ खरबों डॉलर झोंकने से एक खतरनाक स्थिति यह पैदा हुई , कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई। आज इस अमेरिकी गलती को आज सारा विश्व भुगत रहा है । भारत के लिए यह मामला कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण हो जाता है । भारत से लगे देशों में आतंकवाद की फसल दिन दुनी – रात चौगुनी तरक्की कर रही है । सूचनाओ को इकठ्ठा करने की लम्बी चौड़ी कवायद के बाद भी हम हादसों को रोक नही पा रहे हैं ।