सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!

सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!
AMIR KHURSHEED MALIK

Wednesday, February 26, 2014

नमो बनाम युवराज बनाम केजरीवाल

              नमो बनाम युवराज बनाम केजरीवाल



आज सियासत का जो माहौल देश में बना है उससे नहीं लगता कि आगामी लोकसभा चुनाव किन्हीं विचारधाराओं व मुद्दों पर केंद्रित होगा, बल्कि समूचा माहौल दो व्यक्तित्वों को लेकर बनाया जा चुका है जिसमें एक ओर नरेन्द्र मोदी हैं और दूसरी ओर राहुल गांधी। दोनों के दरमियाँ जबानी लड़ाई शुरू हो चुकी है सत्ता तक पहुँचने के लिए दावों पर दावों का दौर जारी है ।मंच,अखबार  और चैनल से निकल कर ये लड़ाई सोशल मीडिया में में पुरे शबाब पर है । अण्णा हजारे के आंदोलन से प्रकाश में आई आम आदमी पार्टी (आप) के नायक और राजनीतिक सरजमीं पर महानायक के तौर पर सामने आए अरविंद केजरीवाल एक ऐसी ही शख्सियत हैं जिन्होंने दिल्ली में अपने पहले ही प्रयास में वहां की जमी-जमाई सरकार के पांव उखाड़ फेंके। और एक ही झटके में कांग्रेस-भाजपा को लोहे के चने चबाने मजबूर कर दिया।उनका इस मुकाबले में त्रिकोण पैदा करने की हैसियत भले ही ना बन पाई हो पर इन दोनों को नुकसान पहुचाने की स्थिति में तो आ ही सकते हैं । सूत्रों के अनुसार आप की रणनीति होगी कि फिलहाल वह कांग्रेस और बीजेपी पर समान रूप से हमला करे, जबकि मुद्दा और मौका देखते हुए रिस्पॉन्स करे। आप पर सीधे-सीधे मोदी के कमेंट्स करने से यह संदेश गया है कि मोदी के लिए अब कांग्रेस ही नहीं आप भी खतरा है। केजरीवाल और मोदी दोनों युवाओं और सोशल मीडिया में बेहद लोकप्रिय हैं। यहां दोनों की बराबर टक्कर होती है। दोनों में न्यू इंडिया के लीडर के तौर पर पेश होने की होड़ है। आप और बीजेपी दोनों ही पार्टियां कांग्रेस और करप्शन के खिलाफ असली जंग लड़ने का दावा करते हुए लोकसभा चुनाव की ताल ठोककर वोटरों को लुभाने की कोशिश में हैं। हाल तक पस्त दिख रही कांग्रेस पार्टी में सुगबुगाहट तेज हो गई है। राजनीतिक पंडित भले ही उसको रेस से बाहर बता रहे हों पर पार्टी ने बिना धैर्य खोये और जल्दबाजी दिखाए अपने आकलन के हिसाब से अपनी तैयारी अब शुरू की है। पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए कमर कसकर तैयार दिख रहे हैं। 

चुनावी मौसम

                                                               सर्वेक्षणों की हकीकत 
हर चुनावी मौसम की तरह इस बार भी हर न्यूज़ चैनल और सर्वेक्षण एजेंसियों के चुनावी आंकलन आने लगे है । लगभग सभी में कांग्रेस को नुकसान और भाजपा को बढ़त की बात दोहरे गई है । हालांकि किसी को बहुमत मिलता नहीं दिखाया गया है । साथ ही क्षेत्रीय दलों और तीसरे मोर्चे को भी फायदा मिलने की संभावना जताई जारही है । लेकिन यहाँ पर हम कुछ पिछले सर्वेक्षणों की बात करेंगे । सबसें पहले बात करते है लोकसभा चुनाव 2009 की। जब भाजपा के दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में पूरी भाजपा दिल्ली की सत्ता पर आसीन होने के जुटी थीं। उस दौरान आने वाले लगभग हर मीडिया सर्वेक्षण में यह बात कही जा रही थी कि काग्रेंस शासित यूपीए का ग्राफ गिर रहा है और सत्ता के शीर्ष तक पहुँचने की डगर काफी कठिन है। हर रिपोर्ट का निष्कर्ष लगभग में यही होता था। कि भाजपा सत्ता में आ रही है। पर जब लोकसभा चुनाव 2009 के परिणाम आयें तो वह अप्रत्याशित थें। यूपीए दुगनी ताकत के साथ सत्ता में आया। अब बात करतें है यूपी विधानसभा चुनाव 2012 की। लोकसभा चुनावों के लिहाज सें अत्यन्त महत्वपूर्ण इस विधान सभा चुनाव में जो चुनावी सर्वेक्षण परिणाम आ रहें थें, उनमें सपा को लाभ तो दिखाया जा रहा था। पर साथ यह भी कहा जा रहा था कि यूपी विधानसभा चुनाव 2012 के परिणाम त्रिशुंक होगें । किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नही मिलेगा। पर जब परिणाम तो सारें मीडिया सर्वेक्षण धरें के धरे रह गयें, ओर सपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आयी। दिल्ली के पिछले चुनाव की बात करें तो केजरीवाल टीम से इतनी अच्छी सफलता की उम्मीद किसी सर्वेक्षण ने नहीं की थी । हालांकि इससे यह सिद्ध नहीं होता कि सर्वेक्षण हमेशा ही गलत होते हैं ।परन्तु इस पर पूरी तरह से भरोसा नहीं किया जासकता । क्योंकि यह सर्वेक्षण चुनिन्दा लोगो पर किये जाते हैं । इनसे हमेशा वास्तविक तस्वीर सामने आयेगी , ऐसा नहीं कहा जा सकता ।उधर एक स्टिंग आपरेशन ने सर्वेक्षण एजेंसियों पर पैसा लेकर रिजल्ट में फेरबदल का आरोप लगाया है , इससे इस पुरे मामले में एक नया मोड़ आ गया है ।

Monday, February 24, 2014

चुनाव २०१४ (3)

अगर तीसरे मोर्चे की बात करें तो नज़र आता है कि उनके पास प्रधानमंत्री पद के भी कई दावेदार होंगे । तब मुलायम के अलावा मायावतीशरद पवार, जयललिता, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी पीएम बनने की रेस में शामिल हो जायेंगे । इनमें से सभी २० या उससे अधिक सीटें जीतने में सक्षम हैं ।  शरद पवार बेशक अपवाद हैं, लेकिन अगर वह १० से १४ सीटें जीतते हैं, तब भी उनका महत्व कम नहीं होगा । तीसरे मोरचे में वाम दल, सपा के अलावा  तेदेपा, राकांपा, रालोद, जद (एस), बीजद, जदयू, नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी, अन्नाद्रमुक या द्रमुक,इनेलो, तेलंगाना राष्ट्र समिति, वाईआरएस कांग्रेस और अन्य छोटे दल शामिल हो सकते हैं । पर ऐसा तभी हो सकता है, जब भाजपा एवं शिवसेना को अलग-थलग कर दिया जाए और बसपा एवं तृणमूल कांग्रेस तटस्थ रहें । कुछ क्षेत्रीय ताकतें दोनों तरफ जा सकती हैं । वो चुनाव बाद के नतीजों के अनुसार फायदे की बात को तरजीह देने में माहिर मानी जाती हैं  ।

चुनाव २०१४ (२)

विधानसभा चुनाव के नतीजे को देखते हुए कांग्रेस पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव बना है । जिससे उबरने के लिए कांग्रेसी प्रयास शुरू भी हो चुके हैं । इसी कड़ी में राहुल गांधी को युवा शक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए सोशल मीडिया और परंपरागत प्रचार के स्रोतों का इस्तेमाल शुरू हो चूका है । कांगेस पिछले विधानसभा चुनावों के दरमियाँ भाजपा की मोदी विंग द्वारा सोशल मीडिया के प्रभावी इस्तेमाल को लेकर भी चिंतित है । इससे निपटने के लिए एक विदेशी कंपनी को सोशल मीडिया की कमान सौंपने का फैसला खुद राहुल गाँधी के दखलंदाजी के बाद लिया गया । इसके पीछे एक मोटा बजट खर्च होने की उम्मीद है । 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस के लिए चुनौतियां और संभावनाएं दोनों हैं चुनाव से पूर्व अन्य दलों के साथ गंठबंधन महत्वपूर्ण है ।लोकसभा चुनाव के सियासी गणित के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जानेवाले राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश आदि में पार्टी की सेहत बेहतर नहीं दिख रही । ऐसे में राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी कार्यकर्ताओं के उत्साह में आयी कमी को दूर करने की है ।कांग्रेस पार्टी के १० साल पुराने परन्तु नए सोच वाले चिराग राहुल गांधी अपने तरकश से कई तीर निकाल रहे हैं। एक तरफ तो अपने भाषणों में वह परंपरा, कांग्रेस पार्टी की सोच और भारत के इतिहास की कड़ी दुहाई दे रहे हैं। वहीं दूसरी ओर वह विपक्ष की मार्केटिंग रणनीति को जनता के सामने उजागर करने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं।

कांग्रेस से भी डीएमके, तृणमूल कांग्रेस पहले ही अलग हो गये है । प्रमुख सहयोगियों में सिर्फ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बची है । उसके साथ को लेकर भी कांग्रेस को आशंका लगी रहती है ।जहां तक सपा, बसपा और राजद का सवाल है, तो ये पार्टियां बिना मांगे समर्थन दे रही हैं । अगर तीसरा मोर्चा प्रभावी हुआ तो कम से कम सपा तो कांग्रेस से दूर हो ही जाएगी । तमाम सर्वे में भी कांग्रेस की हालत बेहद कमजोर दिखाई जा रही है। ऐसे में कांग्रेस अपने प्लान बी पर भी काम करने में जुट गई है। कांग्रेस का प्लान बी किसी भी तरह  एनडीए को सत्ता तक पहुंचने से रोकने का है। इसके लिए राहुल गांधी अंदरूनी तौर पर एक प्लान तैयार कर चुके हैं। इस 'प्‍लान बी' के तहत राहुल कांग्रेस के समर्थन से किसी तीसरे मोर्चे की सरकार बनवा सकते हैं। इसके बाद राहुल को कांग्रेस को मज़बूत करने  का समय मिलेगा जिसके बाद राहुल मध्यावधि चुनाव की स्थिति पैदा करवा सकते हैं। 

चुनाव २०१४ (1)

गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के पीएम इन वेटिंग नरेन्द्र मोदी को पुरे देश की पहली पसंद बताया जा रहा है । विभिन्न सर्वेक्षणों में उनको सर्वाधिक मत प्राप्त हुए हैं ।कांग्रेस की नाकामियों को भुनाने के लिए नरेन्द्र मोदी अपनी चिर-परिचित आक्रामक मुद्रा अपनाये हुए हैं ।उनको भ्रष्टाचार,महंगाई और विकास के नाम पर देश में समर्थन मिलता दिख रहा है ।१९९८ और १९९९ में भाजपा अटल बिहारी वापपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ी थी। संजीदा, समझदार और अनुभवी राजनेता की छवि रखने वाले वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर उसे दोनों बार सत्ता हासिल हुई थी, भले ही पहली सरकार १३ दिन चली, लेकिन अगली सरकार १ सीट का इजाफा करते हुए १८३ का आंकड़ा छूने में सफल हुई, और अन्य पार्टियों के सहयोग से सरकार बनाने में सफल रही और एक सफल कार्यकाल पूरा किया। आज स्थितियां १९९८ या १९९९ वाली नहीं हैं, जब भाजपा अन्य सहयोगी पार्टियों की सहायता से सिंहासन पर बैठी थी। अटलबिहारी वाजपेई जैसा एक सशक्त और दूरदर्शी सोच का व्यक्ति भाजपा का अगुवाई कर रहा था। लेकिन आज भाजपा के कुनबे के कई पुराने साथी अलविदा कह चुके हैं । नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार समिति अध्यक्ष बनने पर शुरू हुआ विवाद पुराने साथी नीतीश कुमार की विदाई के रूप में सामने आया । जनता दल यूनाइटेड, जिसके अध्यक्ष शरद यादव हैं, ऐसी १३वीं पार्टी थी, जिसने भाजपा का साथ छोड़ा। अब एनडीए में केवल शिवसेना, शिरोमणि अकाली बादल और छोटी छोटी आठ पार्टियां हैं ।  इस बीच लाल कृष्ण आडवाणी की नाराज़गी ने पार्टी की अन्दुरुनी कलह को भी उजागर किया । हालांकि इस बात का चुनावों पर कितना असर पड़ेगा , कहना मुश्किल है । भाजपा को अगर सत्ता हासिल करनी है तो उसको एक जादूई आंकड़ा हासिल करना होगा। अकेली भाजपा को २०० से अधिक सीटें बटोरनी होंगी। मौजूदा समय में भाजपा के नहीं, बल्कि एडीए के पास केवल 138 सीटें हैं। भाजपा को गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़,   दिल्ली, यूपी, बिहार एक बेहतरीन प्रदर्शन करना होगा। यहां से आने वाले आंकड़े भाजपा की किस्मत बदल सकते हैं। हालांकि गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में भाजपा की राज्य सरकारें हैं और लोकसभा चुनावों में यहां भाजपा को बढत मिलती दिख रही है। निश्चित रूप से विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा का मनोबल ऊंचा है ।

Thursday, February 20, 2014

आम आदमी

                   सट्टाखोरी , जमाखोरी और भ्रष्टाचार ! इन तीन दानवों के बीच उलझा आम आदमी अपनी न्यूनतम जरूरतों को पूरा करने में ही जीवन निकाल देता है ........ उम्मीद के नाम पर चुनावी वायदों का लालीपाप ही नज़र आता है .................. वाह रे लोकतंत्र !

रुपया और हम

रुपया........ हाय ......... रुपया

अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में दिन-ब-दिन कमजोर होते रुपये ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है । बढ़ते भुगतान असंतुलन, चालू खाता घाटे में वृद्धि और मुद्रास्फीति के दबाव के कारण पिछले 66 सालों में डालर के मुकाबले रूपए की कीमत में 6000 प्रतिशत की गिरावट आई है। जोकि पतन की और अग्रसर अर्थवयवस्था की कहानी खुद बयान करता है । अगर हम अपने पडोसी चीन की ओर नज़र दौडाते हैं तो नज़र आता है की वहां डालर की आमद तरक्की के रास्ते लेकर आती है ,जबकि हमारे यहाँ डालर का आना बहु प्रचारित तो होता है ,लेकिन एक समय के साथ वो हमारी असल पूंजी को भी लेकर वापसी कर जाता है । आयात और निर्यात का अंतर खतरे के निशान को पार कर चुका है । चालू खाते का भयावह घाटा स्थिति को खतरनाक हद तक ले जा रहा है ।लेकिन प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री के पास चिंता जताने के आगे कोई उपाय नज़र नहीं आता । रुपये की हैसियत बढाने के लिए किसी भी सरकार के द्वारा कोई क़दम नहीं उठाये गए , उलटे राजनीतिक लाभ के लिए घाटे की योजनाओ और परियोजनाओं को तरजीह दी गई । भारतीय अर्थव्यवस्था को आधुनिक बनाने के बचकाने प्रयासों से भी रूपए की साख को बट्टा लगा है । आजादी तक भारत अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए आत्म निर्भर था । केवल रक्षा ,एवं विलासिता पूर्ण वस्तुओं के लिए हम आयात के मोहताज़ थे । लेकिन पूरी अर्थव्यवस्था में से इन सबका प्रतिशत बहूत कम था । आज जहाँ विलासितापूर्ण जीवनशैली ने अपने पाँव ग्रामीण अंचल तक पसार लिए हैं वहीँ बुनियादी जरूरतों के लिए भी आयातदर में भयावह बढ़ोत्तरी हुई है ।
आंकड़ों के अनुसार देश की स्वतंत्रता के समय विदेश व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में था और रूपए की कीमत डालर के मुकाबले बराबर थी। अर्थात १९४७ में डालर की कीमत एक रूपए मात्र थी । अगर हम इतिहास के और पुराने पन्ने पलटते हैं तो पता चलता है कि १९२५ में डालर की कीमत मात्र दस पैसे ही थी । इससे पता चलता है कि भारत की अर्थव्यवस्था को हमारे ही कमजोर वित्तीय प्रबंधन ने रसातल में पहुँचाया है ।आज़ादी के बाद से ही विदेश व्यापार का संतुलन भारतीय अर्थव्यवस्था के पक्ष में नहीं रहा । आयात और निर्यात के बीच का फर्क बढ़ता गया और रूपए की गिरती स्थिति पर हमारे वित्तीय प्रबंधकों ने कभी भी ध्यान नहीं दिया । जिसका नतीजा आज हमारे सामने आगया है । मुद्रास्फीति की ऊँची दर के सामने भारतीय बाज़ार लड़खड़ाने लगे हैं । गौरतलब है की विश्व में आर्थिक मंदी के बावजूद भारत ने क़दम जमाने का प्रयास किया , और कुछ हद तक सफल भी रहा लेकिन रूपए की कमजोरी ने आखिर कर झटका दे ही दिया । सरकार के ढ़ुलमुल रवैए और भारतीय रिजर्व बैंक की मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप नहीं करने की नीति ने रूपए की गिरावट को बल दिया। बेहतर फसल की उम्मीद से कुछ आशाएं हैं ,लेकिन चुनावी वर्ष होने के कारण बाज़ार की स्थिति डांवाडोल रहेगी । जिससे बात वहीँ पहुँच जाएगी।