सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!
AMIR KHURSHEED MALIK
Wednesday, February 19, 2014
विरासत -- सूफी अम्बा प्रसाद
हमारी विरासत -- सूफी अम्बा प्रसाद
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रूहेलखंड की धरती ने आजादी के अनगिनत सपूतों को जन्म दिया । इनमे एक महत्वपूर्ण नाम सूफी अम्बा प्रसाद का भी है। अपने समय के प्रकाण्ड विद्वान, और देश प्रेम के अदभुत ज़ज्बे के कारण अंग्रेज़ सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बने अम्बा प्रसाद का कर्म क्षेत्र रूहेलखंड,पंजाब,नेपाल से लेकर बलूचिस्तान, अफ़गानिस्तान और ईरान तक फैला था । अंग्रेजों से अपनी लेखनी से लोहा लेने की बात हो ,या फिर उनके गढ़ में घुस कर जासूसी करने का जोखिम भरा काम हो , अम्बा प्रसाद को महारत हासिल थी। परन्तु आज की पीढ़ी इस विलक्षण प्रतिभा के योगदान से अनभिज्ञ है।
सूफी अम्बा प्रसाद भटनागर का जन्म 21 जनवरी 1858 को मुरादाबाद में हुआ था ।उन्होंने अपनी शिक्षा मुरादाबाद,जालंधर और बरेली में ग्रहण की। उन्होंने एम ए करने के बाद वकालत की डिग्री प्राप्त की।उनके जन्म से एक हाथ नही था ।जिसके बारे में उनका मानना था कि अंग्रेजो से 1857 में स्वतंत्रता के लिए हुई जंग में शहीद होने से पहले ही उनका ये हाथ कट गया था , पुनर्जन्म मिला , परन्तु उनका वह हाथ वापस नहीं मिला। पारसी भाषा के विद्वान अम्बा प्रसाद ने मुरादाबाद से उर्दू साप्ताहिक जाम्युल इलुक का प्रकाशन किया। इसका प्रत्येक शब्द अंग्रेज़ शासन पर प्रहार करता था। हास्य रस के महारथी अम्बा प्रसाद ने देशभक्ति से सम्बंधित अनेक विषयों पर गंभीर चिंतन भी किया।अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ इस जंग में वो हिन्दू मुस्लिम एकता के जबरदस्त हिमायती रहे ।उन्होंने अंग्रेजो की हिन्दू मुसलमानों को लड़वाने के लिए रची गई कई साजिशें अपने अखबार के जरिये बेनकाब की । कई बार जेल में असहनीय कष्ट भरे दिन (1897-1906) उन्हें गुज़ारने पड़े। उनकी सारी संपत्ति भी सरकार ने ज़ब्त कर ली ।लेकिन उन्होंने सर नहीं झुकाया। जेल से छूटने पर निजाम हैदराबाद ने उन्हें सारी सुविधाओ के साथ बसने का निमंत्रण दिया ।परन्तु उनको पता था की उनका जन्म एक बड़े मकसद के लिए हुआ है । अम्बा प्रसाद पंजाब चले गए और हिन्दुस्तान अखबार में काम करने लगे।सरदार अजीत सिंह की भारत माता सोसाइटी से जुड़ कर उन्होंने अपना काम जारी रक्खा। यहाँ पर भी अंग्रेजों की बढती घेराबंदी के कारण उन्हें अजीत सिंह के साथ नेपाल में शरण लेनी पड़ी। परन्तु उनको शरण देने के जुर्म में वहां के गवर्नर को भी पद से हटा दिया गया ,और एक बार फिर सूफी अम्बा प्रसाद को गिरफ्तार करके लाहौर लाया गया। लाला पिण्डी दास के अखबार इंडिया में प्रकाशित उनके लेखों को आपत्तिजनक मानते हुए अभियोग बना कर लगाये गए,पर सिद्ध ना हो सके। उनके द्वारा लिखी पुस्तक जब्त कर ली गई। 1909 में उन्होंने पंजाब से पेशवा अखबार का प्रकाशन शुरू किया। अब अंग्रेज़ सरकार को चिंता हुई कि यह अखबार कही पंजाब में भी बंगाल और रूहेलखंड जैसे हालात ना पैदा कर दे ।दिन-ब-दिन तेज़ होती धरपकड़ से तंग आकर अम्बा प्रसाद ने अपना नाम बदल कर सूफी मोहम्मद हुसैन रख लिया। आखिर कार उनको अपने साथियों के साथ देश छोड़ कर ईरान में शरण लेने के लिए विवश होना ही पड़ा ।लेकिन वहां भी उनका अंग्रेजो के विरुद्ध मुहिम जारी रहा। ईरान के शीराज़ में उन्होंने ग़दर पार्टी के साथ काम किया।ईरान में लिखी गई उनकी पुस्तक आबे हयात काफी चर्चा में रही ।वहां उन्होंने शिक्षा दान का अदभुत कार्य भी किया । उन्होंने मशहूर राजनयिक और शिक्षाविद डॉक्टर असग़र अली हिकमत को पढाया जो आगे चल कर ईरान की राजनीति में ही नहीं विश्व में भी एक सम्मानीय नाम बना।
अंततः अंग्रेजो ने उन्हें गिरफ्तार कर ही लिया। उनको गोली मारने का आदेश हुआ। परन्तु इससे पहले ही 21फरवरी1915 में उनका देहावसान हो गया ।शीराज़ में उनका मकबरा स्थित है। आज भी ईरान में उनका नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है ,पर अफ़सोस ........... हम अपनी क्रांति के इस महत्वपूर्ण स्तम्भ के बारे में जानते भी नही !
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रूहेलखंड की धरती ने आजादी के अनगिनत सपूतों को जन्म दिया । इनमे एक महत्वपूर्ण नाम सूफी अम्बा प्रसाद का भी है। अपने समय के प्रकाण्ड विद्वान, और देश प्रेम के अदभुत ज़ज्बे के कारण अंग्रेज़ सरकार के लिए बड़ी मुसीबत बने अम्बा प्रसाद का कर्म क्षेत्र रूहेलखंड,पंजाब,नेपाल से लेकर बलूचिस्तान, अफ़गानिस्तान और ईरान तक फैला था । अंग्रेजों से अपनी लेखनी से लोहा लेने की बात हो ,या फिर उनके गढ़ में घुस कर जासूसी करने का जोखिम भरा काम हो , अम्बा प्रसाद को महारत हासिल थी। परन्तु आज की पीढ़ी इस विलक्षण प्रतिभा के योगदान से अनभिज्ञ है।
सूफी अम्बा प्रसाद भटनागर का जन्म 21 जनवरी 1858 को मुरादाबाद में हुआ था ।उन्होंने अपनी शिक्षा मुरादाबाद,जालंधर और बरेली में ग्रहण की। उन्होंने एम ए करने के बाद वकालत की डिग्री प्राप्त की।उनके जन्म से एक हाथ नही था ।जिसके बारे में उनका मानना था कि अंग्रेजो से 1857 में स्वतंत्रता के लिए हुई जंग में शहीद होने से पहले ही उनका ये हाथ कट गया था , पुनर्जन्म मिला , परन्तु उनका वह हाथ वापस नहीं मिला। पारसी भाषा के विद्वान अम्बा प्रसाद ने मुरादाबाद से उर्दू साप्ताहिक जाम्युल इलुक का प्रकाशन किया। इसका प्रत्येक शब्द अंग्रेज़ शासन पर प्रहार करता था। हास्य रस के महारथी अम्बा प्रसाद ने देशभक्ति से सम्बंधित अनेक विषयों पर गंभीर चिंतन भी किया।अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ इस जंग में वो हिन्दू मुस्लिम एकता के जबरदस्त हिमायती रहे ।उन्होंने अंग्रेजो की हिन्दू मुसलमानों को लड़वाने के लिए रची गई कई साजिशें अपने अखबार के जरिये बेनकाब की । कई बार जेल में असहनीय कष्ट भरे दिन (1897-1906) उन्हें गुज़ारने पड़े। उनकी सारी संपत्ति भी सरकार ने ज़ब्त कर ली ।लेकिन उन्होंने सर नहीं झुकाया। जेल से छूटने पर निजाम हैदराबाद ने उन्हें सारी सुविधाओ के साथ बसने का निमंत्रण दिया ।परन्तु उनको पता था की उनका जन्म एक बड़े मकसद के लिए हुआ है । अम्बा प्रसाद पंजाब चले गए और हिन्दुस्तान अखबार में काम करने लगे।सरदार अजीत सिंह की भारत माता सोसाइटी से जुड़ कर उन्होंने अपना काम जारी रक्खा। यहाँ पर भी अंग्रेजों की बढती घेराबंदी के कारण उन्हें अजीत सिंह के साथ नेपाल में शरण लेनी पड़ी। परन्तु उनको शरण देने के जुर्म में वहां के गवर्नर को भी पद से हटा दिया गया ,और एक बार फिर सूफी अम्बा प्रसाद को गिरफ्तार करके लाहौर लाया गया। लाला पिण्डी दास के अखबार इंडिया में प्रकाशित उनके लेखों को आपत्तिजनक मानते हुए अभियोग बना कर लगाये गए,पर सिद्ध ना हो सके। उनके द्वारा लिखी पुस्तक जब्त कर ली गई। 1909 में उन्होंने पंजाब से पेशवा अखबार का प्रकाशन शुरू किया। अब अंग्रेज़ सरकार को चिंता हुई कि यह अखबार कही पंजाब में भी बंगाल और रूहेलखंड जैसे हालात ना पैदा कर दे ।दिन-ब-दिन तेज़ होती धरपकड़ से तंग आकर अम्बा प्रसाद ने अपना नाम बदल कर सूफी मोहम्मद हुसैन रख लिया। आखिर कार उनको अपने साथियों के साथ देश छोड़ कर ईरान में शरण लेने के लिए विवश होना ही पड़ा ।लेकिन वहां भी उनका अंग्रेजो के विरुद्ध मुहिम जारी रहा। ईरान के शीराज़ में उन्होंने ग़दर पार्टी के साथ काम किया।ईरान में लिखी गई उनकी पुस्तक आबे हयात काफी चर्चा में रही ।वहां उन्होंने शिक्षा दान का अदभुत कार्य भी किया । उन्होंने मशहूर राजनयिक और शिक्षाविद डॉक्टर असग़र अली हिकमत को पढाया जो आगे चल कर ईरान की राजनीति में ही नहीं विश्व में भी एक सम्मानीय नाम बना।
अंततः अंग्रेजो ने उन्हें गिरफ्तार कर ही लिया। उनको गोली मारने का आदेश हुआ। परन्तु इससे पहले ही 21फरवरी1915 में उनका देहावसान हो गया ।शीराज़ में उनका मकबरा स्थित है। आज भी ईरान में उनका नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है ,पर अफ़सोस ........... हम अपनी क्रांति के इस महत्वपूर्ण स्तम्भ के बारे में जानते भी नही !
विरासत : भुवनेश्वर
हमारी विरासत : भुवनेश्वर
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हमारी विरासत की श्रंखला में आज रूहेलखंड के अमर साहित्यकार भुवनेश्वर से आप को रूबरू कराने का प्रयास कर रहा हूँ । भुवनेश्वर जैसी शख्सियत को शब्दों में समेट कर प्रस्तुत करना मेरे जैसे व्यक्ति के लिए संभव नहीं है । परन्तु प्रयास कर रहा हूँ कि इतिहास के उन अनमोल पलों को हम अनुभव कर सकें । जिनमे भुवनेश्वर जैसा लेखक शाहजहांपुर से निकल कर साहित्य पटल पर अमिट छाप छोड़ गया ।
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भुवनेश्वर साहित्य जगत का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में लीक से अलग किस्म का साहित्य सृजन किया । भुवनेश्वर नें मध्य वर्ग की विडंबनाओं को कटु सत्य के प्रतीरूप में उकेरा। उन्हें आधुनिक एकांकियों के जनक होने का गौरव भी हासिल है । एकांकी, कहानी, कविता, समीक्षा जैसी कई विधाओं में भुवनेश्वर ने साहित्य को नए तेवर वाली रचनाएं दीं। एक ऐसा साहित्यकार जिसने अपनी रचनाओं से आधुनिक संवेदनाओं की नई परिपाटी विकसित की। प्रेमचंद जैसे साहित्यकार ने उनको भविष्य का रचनाकार माना था। इसकी एक ख़ास वजह यह थी कि भुवनेश्वर अपने रचनाकाल से बहुत आगे की सोच के रचनाकार थे। उनकी रचनायों में कलातीतता का बोध है , परन्तु आश्चर्यजनक रूप से से यह भूतकाल से न जुड़ कर भविष्य के साथ ज्यादा प्रासंगिक नज़र आती हैं । ‘कारवां’ की भूमिका में स्वयं भुवनेश्वर ने लिखा है कि ‘विवेक और तर्क तीसरी श्रेणी के कलाकारों के चोर दरवाज़े हैं” । उनका यह मानना उनकी रचनायों में स्पष्टतया द्रष्टिगोचर भी होता भी है। इंसान को वस्तु में बदलते जाने की जो तस्वीर उन्होंने उकेरी , वो आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।
भुवनेश्वर का जन्म शाहजहांपुर के केरुगंज (खोया मंडी) में, 1910 में एक खाते-पीते परिवार में हुआ था। परन्तु बचपन में ही माँ की मौत से अचानक परिस्थितियां उनके विपरीत हो गई । इंटरमीडिएट का ये विद्यार्थी शाहजहांपुर को अलविदा करके इलाहाबाद चला गया। उस समय के भुवनेश्वर का बौदिक ज्ञान ,हिन्दी-अंग्रेजी भाषाओँ पर समान अधिकार , इंसानी रिश्तों को समझने का अदभुत नजरिया समकालीन लेखकों के लिए अचरज से कम नहीं था। परन्तु व्यक्तिगत रूप से स्वयं भुवनेश्वर का जीवन आभावों एवं कठिनताओं का पुलिंदा था । इलाहाबाद,बनारस,लखनऊ में भटकते भुवनेश्वर के लिए मित्र मंडली के घर आसरा, और कठिनाइयों का चोली दामन का साथ रहा । परन्तु इन परेशानियों में भी उनकी साहित्य यात्रा अनवरत जारी रही । एक बार स्वयं प्रेमचंद ने उनसे अपने लेखन में ‘कटुता’ कम करने की राय दी थी ,जिस पर उन्होंने कहा कि इस ‘कटुता’ की उपज के पीछे के कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिये।शायद यही कारण , वो तमाम विसंगतियां थी , जिनका सामना उन्हें अपने जीवन में करना पड़ा ।1957 में लखनऊ स्टेशन पर भुवनेश्वर ने दुनिया को अलविदा कह दिया ।
भुवनेश्वर की साहित्य साधना बहुआयामी थी । कहानी,कविता,एकांकी,और समीक्षा सब में उनकी लेखनी एक नए कलेवर का एहसास दिलाती है । छोटी सी घटना को भी नई ,परन्तु वास्तविकता के सर्वाधिक सन्निकट द्रष्टि से देखने का नजरिया भुवनेश्वर की विशेषता है ।
हंस’ में 1933 में भुवनेश्वर का पहला एकांकी ‘श्यामा: एक वैवाहिक विडम्बना’ प्रकाशित हुआ था । 1935 में प्रकाशित एकांकी संग्रह ‘कारवां’ ने उन्हें एकांकीकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। भुवनेश्व र द्वारा लिखित नाटक ‘तांबे का कीड़ा’ (1946) को विश्व की किसी भी भाषा में भी लिखे गये पहले असंगत नाटक का सम्मान प्राप्त है। उनके द्वारा लिखित एकांकियों में ‘श्यामःएक वैवाहिक विडम्वना’, ‘रोमांसःरोमांच’, ‘स्ट्राइक’, ‘ऊसर’, ‘सिकन्दर’ आदि का नाम उल्लेखनीय है।
भुवनेश्वर की पहली कहानी ‘मौसी’ को प्रेमचंद ने समकालीन कहानियों के प्रतिनिधि संकलन ‘हिंदी की आदर्श कहानियां’ में स्थान दिया। उनकी कहानी ‘भेडिये’ हंस के अप्रैल 1938 अंक में प्रकाशित हुई । इस कहानी ने आधुनिक कहानियों की परम्परा में मज़बूत नीव का निर्माण किया । कैसे रेगिस्तान से गुजरता बंजारा भेडिय़ों से जान बचाने के लिए उनके आगे चुग्गा फेंकता है। कहानी और जीवन दोनों में फेंकने के इस क्रम में सबसे पहले फेंकी जाती हैं वो चीजें जो अपेक्षाकृत कम महत्व की हैं। इस कहानी ने जीवन की कडवी सच्चाई को बिना लाग-लपेट के प्रस्तुत किया। कुछ साहित्यकार तो इस कहानी के मर्म को किसी मैनेजमेंट क्लास के चुनिन्दा निष्कर्षों में भी सर्वश्रेष्ट मानते हैं। ‘मौसी’, ‘लड़ाई’, ‘माँ बेटे’, ‘मास्टनी’ आदि अन्य उल्लेखनीय कहानियाँ हैं।
इसके अतिरिक्त भुवनेश्वर ने अंग्रेजी तथा हिन्दी में कुछ कविताएं तथा आलोचनात्मक लेख भी लिखे हैं। परन्तु उनके कृतित्व को पहचानने में लोगों ने भूल कर दी ।शायद यही कारण था, की इस अनोखे रचनाकार को पूरा जीवन संघर्षो और विवादों में गुजारना पड़ा । प्रेमचंद ने उनसे हंस से स्थाई रूप से जुड़ने का आग्रह किया था ।परन्तु अनजाने कारणों से ये संवाद पूरा ना हो सका । हालांकि उनकी रचनाये हंस में लगातार प्रकाशित होती रहीं । लेकिन अगर वो हंस के साथ जुड़ जाते तो उनका रचना संसार कहीं अधिक विस्तृत रूप में हमारे सामने होता । उनके अंतिम समय की रचनाओं को सहेजना वाला उनके साथ कोई नहीं था , जिसके फलस्वरूप उस दौरान रफ़ कागजों के पीछे लिखा गया हिंदी और अंग्रेजी का पूर्णतया मौलिक साहित्य अंधेरों में गुम हो गया ।
भुवनेश्वर की उपलब्ध सभी रचनाओं को आज पुनः लोगों तक पंहुचाने की आवश्यकता है । आज के साहित्यकारो को भी देखना चाहिए कि आज के परिवेश में भी कहीं अधिक प्रासंगिक भुवनेश्वर की रचनाये सर्वाधिक विपरीत परस्थितियों में कैसे परवान चढ़ीं । धन्य है रूहेलखंड की धरती जिसने भुवनेश्वर जैसे लेखक को जन्म दिया ।
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हमारी विरासत की श्रंखला में आज रूहेलखंड के अमर साहित्यकार भुवनेश्वर से आप को रूबरू कराने का प्रयास कर रहा हूँ । भुवनेश्वर जैसी शख्सियत को शब्दों में समेट कर प्रस्तुत करना मेरे जैसे व्यक्ति के लिए संभव नहीं है । परन्तु प्रयास कर रहा हूँ कि इतिहास के उन अनमोल पलों को हम अनुभव कर सकें । जिनमे भुवनेश्वर जैसा लेखक शाहजहांपुर से निकल कर साहित्य पटल पर अमिट छाप छोड़ गया ।
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भुवनेश्वर साहित्य जगत का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में लीक से अलग किस्म का साहित्य सृजन किया । भुवनेश्वर नें मध्य वर्ग की विडंबनाओं को कटु सत्य के प्रतीरूप में उकेरा। उन्हें आधुनिक एकांकियों के जनक होने का गौरव भी हासिल है । एकांकी, कहानी, कविता, समीक्षा जैसी कई विधाओं में भुवनेश्वर ने साहित्य को नए तेवर वाली रचनाएं दीं। एक ऐसा साहित्यकार जिसने अपनी रचनाओं से आधुनिक संवेदनाओं की नई परिपाटी विकसित की। प्रेमचंद जैसे साहित्यकार ने उनको भविष्य का रचनाकार माना था। इसकी एक ख़ास वजह यह थी कि भुवनेश्वर अपने रचनाकाल से बहुत आगे की सोच के रचनाकार थे। उनकी रचनायों में कलातीतता का बोध है , परन्तु आश्चर्यजनक रूप से से यह भूतकाल से न जुड़ कर भविष्य के साथ ज्यादा प्रासंगिक नज़र आती हैं । ‘कारवां’ की भूमिका में स्वयं भुवनेश्वर ने लिखा है कि ‘विवेक और तर्क तीसरी श्रेणी के कलाकारों के चोर दरवाज़े हैं” । उनका यह मानना उनकी रचनायों में स्पष्टतया द्रष्टिगोचर भी होता भी है। इंसान को वस्तु में बदलते जाने की जो तस्वीर उन्होंने उकेरी , वो आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।
भुवनेश्वर का जन्म शाहजहांपुर के केरुगंज (खोया मंडी) में, 1910 में एक खाते-पीते परिवार में हुआ था। परन्तु बचपन में ही माँ की मौत से अचानक परिस्थितियां उनके विपरीत हो गई । इंटरमीडिएट का ये विद्यार्थी शाहजहांपुर को अलविदा करके इलाहाबाद चला गया। उस समय के भुवनेश्वर का बौदिक ज्ञान ,हिन्दी-अंग्रेजी भाषाओँ पर समान अधिकार , इंसानी रिश्तों को समझने का अदभुत नजरिया समकालीन लेखकों के लिए अचरज से कम नहीं था। परन्तु व्यक्तिगत रूप से स्वयं भुवनेश्वर का जीवन आभावों एवं कठिनताओं का पुलिंदा था । इलाहाबाद,बनारस,लखनऊ में भटकते भुवनेश्वर के लिए मित्र मंडली के घर आसरा, और कठिनाइयों का चोली दामन का साथ रहा । परन्तु इन परेशानियों में भी उनकी साहित्य यात्रा अनवरत जारी रही । एक बार स्वयं प्रेमचंद ने उनसे अपने लेखन में ‘कटुता’ कम करने की राय दी थी ,जिस पर उन्होंने कहा कि इस ‘कटुता’ की उपज के पीछे के कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिये।शायद यही कारण , वो तमाम विसंगतियां थी , जिनका सामना उन्हें अपने जीवन में करना पड़ा ।1957 में लखनऊ स्टेशन पर भुवनेश्वर ने दुनिया को अलविदा कह दिया ।
भुवनेश्वर की साहित्य साधना बहुआयामी थी । कहानी,कविता,एकांकी,और समीक्षा सब में उनकी लेखनी एक नए कलेवर का एहसास दिलाती है । छोटी सी घटना को भी नई ,परन्तु वास्तविकता के सर्वाधिक सन्निकट द्रष्टि से देखने का नजरिया भुवनेश्वर की विशेषता है ।
हंस’ में 1933 में भुवनेश्वर का पहला एकांकी ‘श्यामा: एक वैवाहिक विडम्बना’ प्रकाशित हुआ था । 1935 में प्रकाशित एकांकी संग्रह ‘कारवां’ ने उन्हें एकांकीकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। भुवनेश्व र द्वारा लिखित नाटक ‘तांबे का कीड़ा’ (1946) को विश्व की किसी भी भाषा में भी लिखे गये पहले असंगत नाटक का सम्मान प्राप्त है। उनके द्वारा लिखित एकांकियों में ‘श्यामःएक वैवाहिक विडम्वना’, ‘रोमांसःरोमांच’, ‘स्ट्राइक’, ‘ऊसर’, ‘सिकन्दर’ आदि का नाम उल्लेखनीय है।
भुवनेश्वर की पहली कहानी ‘मौसी’ को प्रेमचंद ने समकालीन कहानियों के प्रतिनिधि संकलन ‘हिंदी की आदर्श कहानियां’ में स्थान दिया। उनकी कहानी ‘भेडिये’ हंस के अप्रैल 1938 अंक में प्रकाशित हुई । इस कहानी ने आधुनिक कहानियों की परम्परा में मज़बूत नीव का निर्माण किया । कैसे रेगिस्तान से गुजरता बंजारा भेडिय़ों से जान बचाने के लिए उनके आगे चुग्गा फेंकता है। कहानी और जीवन दोनों में फेंकने के इस क्रम में सबसे पहले फेंकी जाती हैं वो चीजें जो अपेक्षाकृत कम महत्व की हैं। इस कहानी ने जीवन की कडवी सच्चाई को बिना लाग-लपेट के प्रस्तुत किया। कुछ साहित्यकार तो इस कहानी के मर्म को किसी मैनेजमेंट क्लास के चुनिन्दा निष्कर्षों में भी सर्वश्रेष्ट मानते हैं। ‘मौसी’, ‘लड़ाई’, ‘माँ बेटे’, ‘मास्टनी’ आदि अन्य उल्लेखनीय कहानियाँ हैं।
इसके अतिरिक्त भुवनेश्वर ने अंग्रेजी तथा हिन्दी में कुछ कविताएं तथा आलोचनात्मक लेख भी लिखे हैं। परन्तु उनके कृतित्व को पहचानने में लोगों ने भूल कर दी ।शायद यही कारण था, की इस अनोखे रचनाकार को पूरा जीवन संघर्षो और विवादों में गुजारना पड़ा । प्रेमचंद ने उनसे हंस से स्थाई रूप से जुड़ने का आग्रह किया था ।परन्तु अनजाने कारणों से ये संवाद पूरा ना हो सका । हालांकि उनकी रचनाये हंस में लगातार प्रकाशित होती रहीं । लेकिन अगर वो हंस के साथ जुड़ जाते तो उनका रचना संसार कहीं अधिक विस्तृत रूप में हमारे सामने होता । उनके अंतिम समय की रचनाओं को सहेजना वाला उनके साथ कोई नहीं था , जिसके फलस्वरूप उस दौरान रफ़ कागजों के पीछे लिखा गया हिंदी और अंग्रेजी का पूर्णतया मौलिक साहित्य अंधेरों में गुम हो गया ।
भुवनेश्वर की उपलब्ध सभी रचनाओं को आज पुनः लोगों तक पंहुचाने की आवश्यकता है । आज के साहित्यकारो को भी देखना चाहिए कि आज के परिवेश में भी कहीं अधिक प्रासंगिक भुवनेश्वर की रचनाये सर्वाधिक विपरीत परस्थितियों में कैसे परवान चढ़ीं । धन्य है रूहेलखंड की धरती जिसने भुवनेश्वर जैसे लेखक को जन्म दिया ।
चुनावी आहट के तेज़ होते
ही राजनीतिक जंग तेज़ हो चुकी है ।जहाँ कांग्रेस सत्ता में बरक़रार रहने को जतन कर
रही है। वहीँ भाजपा कांग्रेस को महंगाई,भ्रष्टाचार के मुद्दों पर मोदी के सहारे
सत्ता से बेदखल करने पर आमादा है। इन दोनों की जंग के बीच तीसरे मोर्चे का गठन दिलचस्प
मोड़ ले रहा है।इस उठापटक के बीच आम आदमी पार्टी ने जन लोकपाल बिल पेश न कर पाने की
विफलता का ठीकरा भाजपा-कांग्रेस के सर पर फोड़ते हुए इस्तीफ़ा दे दिया है । इस
इस्तीफे की धमक लोकसभा चुनाव तक जा सकती है , इससे इनकार नहीं किया जा सकता ।
कांग्रेस जहाँ संवैधानिक दायरे की आड़ में बिल का विरोध का दावा कर रही है , वहीँ
भाजपा भी बिल का समर्थन करते हुए भी सहमत नज़र नहीं आ रही है ।केजरीवाल का साथ छोड़
चुके अन्ना हजारे भी इस मुद्दे पर केजरीवाल के साथ नजर आ रहे हैं ।आप के
रणनीतिकारों को ये पक्का भरोसा है कि लोकसभा चुनावों में लाभ के साथ साथ आगामी
दिल्ली विधानसभा चुनावों में उन्हें भरपूर सफलता मिलेगी । देश की सत्ता पर 2014 में कौन
काबिज होगा, राजनीतिक पर्यवेक्षक इसके कयास लगा रहे हैं । परन्तु
लड़ाई दिलचस्प मोड़ पर है ,इससे इनकार नहीं किया जा सकता । दिल्ली में आप के नये राजनीतिक
प्रयोगों की ऐतिहासिक कामयाबी और उसके बाद नाटकीय ढंग से , सत्ता से विदाई के बाद
नजरें इस बात पर भी हैं कि 2014 में
भारतीय राजनीति जाति-धर्म, परिवारवाद, क्षेत्रवाद आदि से जुड़े पारंपरिक चुनावी समीकरणों
में ही उलझी रहेगी या भ्रष्टाचार, महंगाई, गरीबी और बेरोजगारी जैसे आम आदमी से जुड़े मुद्दे
चुनावी राजनीति में बड़ी भूमिका निभायेंगे । इतना तय है कि 2014 के आम चुनाव को महंगाई, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, संप्रदायवाद आदि मुख्य मुद्दे प्रभावित करेंगे, क्योंकि इन मुद्दों को हल करने का तरीका कोई नहीं बता
रहा है । देश की सत्ताधारी पार्टी और मुख्य विपक्षी पार्टी सिर्फ पीएम कंडीडेट कौन
होगा इस पर बहस कर रही हैं ।
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