सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!

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AMIR KHURSHEED MALIK
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Tuesday, May 3, 2016

बेशर्म राजनीति

स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए बेहतर होता कि भारतीय राजनीति जाति-धर्म, परिवारवाद, क्षेत्रवाद आदि से जुड़े पारंपरिक तिकड़मों में उलझी ना रह कर महंगाई, भ्रष्टाचार, गरीबी-बेरोजगारी, विकास , शिक्षा आदि आम आदमी से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करती । जिसकी कमी हमेशा नज़र आई है । दरअसल कई सुधारों के बाद भी अभी तक भारतीय जनमानस स्वयं के हित के लिए उतना जागरूक नहीं हो पाया है । आज भी हम ज़हरीले बयानों के ज़रिये ध्रुवीकरण की कोशिश हो , या बेहूदा बयानों से किसी के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने की हरकत हो , जाने-अनजाने आसान शिकार बनते ही हैं । उकसाने की यह कोशिशे लोकतंत्र की मूलभावना के खिलाफ है । लेकिन अफ़सोस , वोट के फायदे का गणित , सही-गलत के आंकलन को हमेशा बौना साबित करता आया है । रही सही कसर चैनल की ब्रेकिंग न्यूज़ की लगातार चिल्लाती आवाज़ पूरी कर देती हैं । क्या इन नेताओं का मकसद सिर्फ दलीय राजनीति का परचम फहराना ही रह गया है ? हमारे राजनीतिक दल सिर्फ सत्ता के ख्वाब पाल कर जायज़-नाजायज़ के फर्क को अनदेखा कर हर रास्ता अपनाने को तैयार हैं । देश को रचनात्मक प्रयासों की जरुरत है , ना कि ज़हर बूझे बयानों की । नफरत को तो इन ज़हरीले बयानों से हवा दी जा सकती है , तरक्की को नहीं । विकास ,अमन और चैन के दरमियाँ ही पनप सकता है , ज़हरीले बयानों के बीच नहीं ।

Friday, January 2, 2015

“यू टर्न” से “राईट टर्न”

कन्याकुमारी से कश्मीर तक पूरे देश के लोगों की उम्मीद है विकास , सुशासन और रोजगार। यों तो नई सरकार के लिए छह महीने का कार्यकाल बहुत ज्यादा नहीं होता, लेकिन यह सरकार अन्य सरकारों की तरह सामान्य नहीं है। इतने बड़े पैमाने पर युवाओं ने शायद ही किसी सरकार को वोट दिया हो। परिवर्तन के लिए हमेशा तैयार रहने वाली यह पीढ़ी अपनी अपेक्षाओं पर सरकार को तौल रही है । उसको विकास , सुशासन और रोजगार तो चाहिए ही है । पुराने वायदों पर अमल भी चाहिए । जोकि बीजेपी के परंपरागत वोटर की भी प्राथमिकता होगी । ऐसे में सरकार के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं । लेकिन उनके पास यह सब करने के लिए बहुमत से लबरेज़ एक लम्बा सुनिश्चित कार्यकाल भी है । देखना यह है कि लोगों की  
“यू टर्न” से “राईट टर्न” तक की चाहत कब पूरी हो पाएगी । 

Wednesday, March 19, 2014

अवसरवादिता का जायका

राजनीति में सिद्धांत और विचार काफी पीछे छूट गए हैं , अवसरवादिता का भरपूर जायका चख चुकी राजनीति आज अपने निम्नतर स्तर पर है ! सत्ता की ललक में कल-आज-कल के चेहरे कई रंग बदल चुके हैं !