सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!

सच की तलाश में शुरू हुआ सफ़र.....मंजिल तक पहुंचेगा जरुर !!!
AMIR KHURSHEED MALIK

Thursday, March 19, 2015

“फायदे के वायदे” का बजट

आम बजट भी आम लोगों की उम्मीदों पर ही खरा नहीं उतर पाया । यह बजट आम लोगों को चुनावी वायदे जैसे फायदे के वायदे करता हुआ नजर आया। हालांकि ख़ास लोगों की ज़मात ने इस बजट का स्वागत किया है । लोकसभा में वित्त मंत्री अरूण जेटली ने आम बजट का पिटारा तो खोला ,पर मध्यम वर्ग के लोगों को इससे मायूसी ही हाथ लगी। बजट को लेकर अपेक्षाएं हमेशा रहती हैं, जो इस बार कुछ अधिक ही थीं, क्योंकि इस सरकार का पहला पूर्ण बजट था।  लेकिन इस बजट के बाद लोगों को अच्छे दिन आते नहीं दिखाई दे रहे। प्रधानमन्त्री द्वारा जिस कडवी दवा का ज़िक्र किया जा रहा था , शायद उस कडवी दवा की पहली खुराक सामने आ गई है । हालांकि बजट को लेकर बड़े उद्योगों की ओर से अधिकतर सकारात्मक प्रतिकिया आई है। इंडस्ट्री के अधिकतर नुमाइंदे बजट को बेहतर मान रहे हैं । कुल मिलाकर इंडस्ट्री के ज़्यादातर लोगों ने इस बजट को अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर माना है।इंडस्ट्री के इस रुख को बजट में कॉर्पोरेट टैक्स की दर 5 प्रतिशत कम करने के बड़े तोहफे की उपज माना जा सकता है। उधर अमेरिकी मीडिया ने भारत की नई सरकार के पहले पूर्ण बजट को वृद्धि उन्मुख बताते हुए कहा है कि वित्तमंत्री अरुण जेटली की घोषणाओं से निवेश को मजबूती मिलेगी और बुनियादी ढांचे पर जोर बढ़ेगा।
लोगो को अपेक्षाएं थी कि इस बजट में सामाजिक सुरक्षा व जनता को महंगाई से निजात दिलाना बजट की बुनियादी परिकल्पना होगी । यदि आम लोगों की दृष्टि से देखें तो इस बार का बजट आम लोगों की आधारभूत आवश्यकताओं पर खरा नहीं उतरा है। मध्यवर्ग को आयकर सीमा में पिछले बजट में प्रदत्त सीमा में कोई और छूट ना मिलना अखर रहा है । बढती महंगाई के मद्देनज़र मध्यम वर्ग के लिए यह छूट सभी विशेषज्ञ आँक रहे थे । नौकरी पेशा और छोटे व्यवसायी के लिए यह छूट बहुत मायने रखती है । सर्विस टैक्स में बढ़ोत्तरी आम नागरिकों की जेब पर अतिरिक्त बोझ डालने जैसी ही है। पहले से ही सर्विस टैक्स के दायरे में आये तमाम छोटे धंधे 12.36 प्रतिशत को पिछली सरकार की ज्याद्दती मान रहे थे । लेकिन इस दर को 14 प्रतिशत तक पहुचाने के ऐलान से कीमतों में वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता । सर्विस टैक्स में वृद्धि की मार का सबसे अधिक असर वेतनभोगियों और मध्यम वर्ग पर ही पड़नेवाली है। इसी वर्ग ने मोटे तौर पर मोदी के पक्ष में वोट भी दिया था। अपने बचाव में जेटली का कहना है कि देश का अगर विकास होता है तो उसका फायदा सभी वर्गों को प्राप्त होता है, जिसमें मध्यम वर्ग भी शामिल है। दूरगामी प्रभावों को देखा जाए तो कॉरपोरेट सेक्टरों में दी गई 5 फीसदी की छूट से आने वाले समय में युवाओं को रोजगार के अधिक अवसर विकसित हो सकते हैं । परन्तु उसके लिए कई और बुनियादी बदलाव भी लाने होंगे ।अगर पिछले आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2005 से 2010 के बीच देश में 270 लाख रोजगार उत्पन्न हुए, परंतु स्व-रोजगार में 250 लाख की कटौती हुई ऐसे में प्रभावी रोज़गार केवल 20 लाख लोगो के लिए ही फायदेमंद साबित हुआ इस अवधि में लगभग 10 करोड़ युवाओं ने अपने कैरियर की शुरुआत की परन्तु केवल 5 प्रतिशत युवाओं को रोजगार मिल पाया यही बड़ा अंतर पिछली सरकार के लिए युवा वर्ग के असंतोष का कारण भी बना ।इस दौरान मैन्युफैक्चरिंग में रोजगार में 7 प्रतिशत की कटौती हुई थी हालाँकि यह उन्नत मशीनरी की आमद का संकेत था । पर रोज़गार घटने का खामियाजा मनमोहन सरकार के लिए चुनौती बन कर सामने आया ।देश की आर्थिक विकास दर बढ़ी, उद्योगों ने लाभ कमाया, सेंसेक्स में उछाल आया, परंतु रोजगार के अवसर कम हो गए।यही स्थिति आगे नहीं होगी ऐसी कोई ठोस आशा यह बजट भी जगा नहीं पाया है ।
इस बजट में मुद्रा बैकों की योजना में 1000 करोड़ का निवेश एक अच्छा कदम है । हालांकि इसको अधिक विस्तृत रूप दिया जाता तो और बेहतर परिणाम की आशा की जा सकती थी ।जीडीपी के नाम पर आंकड़ो का खेल जारी है । महंगाई से जनता परेशान हो चुकी है, उसको तुरंत हल की उम्मीद थी । अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमते कम होने के बावजूद रेल किराए में कमी का न होना लोगो को अखरा ।लेकिन इससे भी ज्यादा जरुरी वस्तुओं के माल भाड़े में वृद्धि से महंगाई की एक और दस्तक भी सुनाई पड गई है । भारतीय उपभोक्ता परिसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनन्त शर्मा कहते हैं कि बजट में सामाजिक सुरक्षा व जनता को महंगाई से निजात दिलाना बजट की बुनियादी आवश्यकता होनी चाहिए। वित्त मंत्री कंपनियों को आकर्षित करना चाहते हैं, परंतु वे भूल रहे हैं कि विदेशी निवेशकों द्वारा सस्ते माल का उत्पादन किये जाने से तमाम स्व-रोजगार बंद हो जाते हैं मेक इन इंडिया यदि वर्तमान स्वरुप में ही  सफल हुआ तो भी आम आदमी को रोजगार छिनने के आसार बनेंगे ।मेक इन इण्डिया की परिकल्पना निःसंदेह अच्छी है , पर उसमें स्थानीय लोगों के रोजगार की भी सुरक्षा आवश्यक है । वेल्थ टैक्स को खत्म करके एक करोड़ रुपये से ज्यादा की सालाना आमदनीवाले वर्ग पर कर की दर बढ़ने से आम आदमी या मध्यम वर्ग को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। इस क़दम का तो स्वागत किया जाना चाहिए । विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाने में विफलता के बाद सरकार ने बजट के जरिये नया कालाधन पैदा होने के खिलाफ कार्रवाई के प्रावधान किये हैं
बजट में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास पर खासा जोर दिया गया है इसके आवंटन में काफी वृद्धि की गयी हैइंफ्रास्ट्रक्चर के अलावा मैन्युफक्चरिंग क्षेत्र के लिए भी इस बजट में काफी कुछ है मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के विकास से रोजगार सृजन की संभावनाओं में वृद्धि होगी।लेकिन अगर वर्तमान ढर्रे पर ही काम किया गया तो रोज़गार में कटौती से इनकार नहीं किया जा सकता । वित्त मंत्री ने संपत्ति कर को खत्म कर दिया है हालांकि इसे खत्म करने की बजाय सही तरीके से लागू किया जाता तो आर्थिक मोर्चे पर सम्पत्ति से उपजे कर का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता था वित्त मंत्री के दो उद्देश्यों में परस्पर अंर्तविरोध है वे चाहते हैं कि देश पश्चिमी देशों की तरह विकसित हो जाये साथ-साथ वे आम आदमी के लिये अच्छे दिन लाना चाहते हैं, यानी रोजगार भी बनाना चाहते हैं ये दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते हैं वित्त मंत्री को विश्व अर्थव्यवस्था की इस सच्चाई को अनदेखा नहीं करना चाहिए बहुराष्ट्रीय और घरेलू बड़ी कंपनियों के सहारे अच्छे दिन नहीं आ सकते
देश में केवल तीन फीसदी लोग ही आयकर रिटर्न दाखिल करते हैं।यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है । इसलिए कर नहीं देनेवालों पर शिकंजा कसने की जरूरत है गरीब आदमी के लिए पेंशन स्कीम की घोषणा अच्छा कदम है इससे करोड़ों गरीबों को सामाजिक सुरक्षा मिल पायेगी सरकार ने इसके अलावा सामाजिक सुरक्षा के लिए कुछ और भी घोषणाएं की हैसाथ ही, सब्सिडी के बोझ को कम नहीं किया गया हैऐसी आशंका थी कि बजट में यूरिया की कीमत को बाजार के हवाले किया जा सकता है, लेकिन किसानों के हितों के दबाव को को देखते हुए ऐसा नहीं किया गया
एक अन्य नीतिगत बदलाव के रूप में देश के बडे़ नौ बंदरगाह ट्रस्टों को आधुनिक और विकसित क्षमता हासिल करते हुए निगमित करने का फैसला लिया गया है यह एक बड़ी आवश्यकता थी लेकिन इस कदम से सरकार ने संगठित मजदूर संघों से टकराव का खतरा भी सामने नज़र आरहा है बडे़ इंफ्रास्ट्रक्चर के महत्वपूर्ण क्षेत्र में वित्त मंत्री ने पिछले साल के आवंटन में 70 हजार करोड़ बढ़ाते हुए 3,17,889 करोड़ की राशि निर्धारित की गयी है इससे कुछ बदलाव तो अवश्य आएगा सरकार रेल, सड़क और सिंचाई परियोजनाओं में निवेश के लिए बांड जारी करेगी, जिस पर कर छूट भी मिलेगी यह छूट लोगों को बांड खरीदने के लिए प्रोत्साहित करेगी। सुकन्या योजना को और बेहतर तरीके से प्रोत्साहित किया जा सकता था ।इसी तरह 4000 मेगावाट क्षमता की पांच नये बिजली परियोजनाएं घोषित की गयी हैं कुदानकुलाम परमाणु बिजली परियोजना की दूसरी इकाई की योजना भी है अन्य प्रमुख घोषणाओं में सरकार ने अतिरिक्त एक लाख किलोमीटर सड़क बनाने की घोषणा भी की हैग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में आवंटन पांच हजार करोड़ रुपया बढ़ा कर 40,699 करोड़ कर दिया गया है, लेकिन, सरकार ने इसे भवन, सड़क और नहर जैसे निर्धारण करने योग्य लक्ष्यों के साथ जोड़ने की पहल की है छोटे व्यापारियों के लिए 20 हजार करोड़ रुपये के कोष के साथ एक मुद्रा बैंक की शुरू करने की घोषणा की गयी है अगर यह सफल होती है, तो यह नये उद्यमियों के लिए बड़ा अवसर होगा । लेकिन व्यवहारिक धरातल पर सिस्टम की जटिलताएं इसमें रुकावट डाल सकती है ।इसके लिए अगले कुछ महीने सरकार की कार्यशैली ही इन योजनाओं की दशा और दिशा तय करेगी ।

हर बज़ट में सब्सिडी एक बड़ा मुद्दा होती है जिसमें लगभग 3.77 लाख करोड़ रकम खर्च होती है धूम-धड़ाका बजट की आकांक्षा रखनेवालों के लिए यह बड़ा पकवान है।हर वर्ष बड़े वायदों और उम्मीदों के बीच मनपसंद योजनाओं को परवान चढ़ाया जाता है । भारत की राजनीतिक व्यवस्था के कारण हर सरकार को ताकतवर समूहों का सामना करना पड़ता है इसी तरह गरीबी रेखा से नीचे बसर करनेवाले लोगों को सब्सिडी पर खाद्यान्न आपूर्ति भी अहम मुद्दा बन जाता है। पिछली सरकार की इस योजना पर भाजपा ने काफी हो हल्ला मचाया था । पर उससे मुंह मोड़ने का साहस नई सरकार भी नहीं कर सकी । इसी तरह मनरेगा को सरकारी पैसे की फिजूलखर्ची बताने वाली भाजपा भी मनरेगा के पिछले बजट के प्रावधानों में बढ़ोत्तरी करने को मजबूर हो गई । जब तक सरकारें अपनी कथनी और करनी में सामंजस्य नहीं लाती , बजट के ढुलमुल प्रभावों से देश विचलित होता रहेगा । जो भी घोषणाएं और योजनाये सामने लाई जाती हैं, उन पर ठोस क़दम व्यवस्था को दूरुस्त करते हुए सामने आने चाहिए । (- आमिर खुर्शीद मलिक)

Monday, March 16, 2015

विपरीत ध्रुवों के मिलन की गर्माहट

शपथ लेते ही मुख्यमंत्री मुफ्ती मो. सईद का विवादास्पद बयान, फिर पीडीपी विधायकों द्वारा अफजल गुरू के अवशेष उसके परिवारजनों को सौंपे जाने की मांग और उसके बाद पांच साल से जेल में बंद अलगाववादी मसरत आलम की एकाएक रिहाई ने न सिर्फ इस राज्य बल्कि समूचे देश की राजनीति में हलचल मचा दी है। एक गठबंधन सरकार के लिए इससे ज्यादा बुरी शुरुआत और क्या हो सकती है? इसके लिए यकीनन गठबंधन के दोनों घटक ही ज़िम्मेदार माने जाएंगे।इस मुद्दे पर पैदा हुई गर्माहट से भूमि अधिग्रहण क़ानून सहित अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे बहुत पीछे रह गए ।चौराहों से लेकर संसद तक यही मुद्दा गर्माहट पाता रहा ।
उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव के मिलन जैसी परिकल्पना ही जम्मू और कश्मीर की नई सरकार के गठन के साथ ही आंकी जा रही थी । यह तो सबको लग रहा था कि विपरीत विचारधारा का यह गठबंधन बहुत लम्बा समय शायद नहीं पा पायेगा । मुफ्ती इस असलियत को जानते हैं। भाजपा के रणनीतिकार भी इस असलियत से अनजान नहीं हैं । दोनों ही पक्ष सत्ता का लाभ उठाकर अपनी राजनीतिक स्थिति इतनी मजबूत कर लेना चाहते हैं जिससे मध्यावधि चुनाव होने की स्थिति में वे स्थायित्व के नाम पर स्पष्ट बहुमत हासिल कर सकें। जहाँ पीडीपी घाटी के वोटर पर निगाह गडाए है । इधर भाजपा की सोच भी जम्मू क्षेत्र में और अधिक सफलता के साथ सत्ता के कण्ट्रोल तक जाना है ।लेकिन बदलते घटनाक्रम में भाजपा को कई सवालों के घेरे में आना पड रहा है , जिनके जवाब उसके लिए सहज नहीं होंगे । पार्टी ने पहले तो अपने मूल मुद्दे धारा 370 को समझौते के नाम पर कुर्बान किया । अब मुफ्ती के बयानों एवं निर्णयों का विरोध होने से कश्मीर में पीडीपी का जनाधार तो मजबूत होता जा रहा है , परन्तु भाजपा पूरे देश में साख गंवा रही है।दुखद यह है कि तात्कालिक राजनीतिक लाभ के लिए कश्मीर जैसे जटिल मसले पर राष्ट्रीय सरोकार के दूरगामी और बड़े मक़सद हाशिए पर डाले जा रहे हैं ।
मीडिया ने जिस तरह इस मुद्दे को क़ानून-न्याय-व्यवस्था की बजाय राष्ट्रवाद के आईने में देखा , उससे भाजपा अपने को नुकसान में पाने लगी है । मुफ़्ती पर आरोप लग रहे हैं , पर वो अपनी चिर परिचित  हीलिंग-टच पॉलिसीको आगे बढाने पर दृढ़ नज़र आ रहे है ।अब भाजपा को ही तय करना है कि उनका विरोध सिर्फ बयानों तक ही है , या वो इसको कोई अमली जामा पहनाने की हिम्मत भी जुटा पायेंगे ?



Friday, March 13, 2015

दामोदर स्वरूप 'विद्रोही' : वीर रस के कालजयी रचनाकार

 
शाहजहाँपुर को गर्व है कि अनगिनत शहीदों को देश के लिए समर्पित करने वाली उसकी भूमि ने साहित्य जगत के विशिष्ठ हस्ताक्षरों को भी जन्म दिया है । ऐसे ही एक सशक्त हस्ताक्षर विख्यात कवि दामोदर स्वरूप 'विद्रोही'  जी अब हमारे बीच नहीं है,परन्तु उनके क्रांतिकारी तेवरों वाली रचनाओं से हिंदी साहित्य जगत अभिभूत है ।
"मैं लिख न सका कुछ भी रिसालों के वास्ते,
उत्तर न बन सका हूँ सवालों के वास्ते।
लेकिन सियाह रात जब छायेगी मुल्क पे,
मेरी तलाश होगी उजालों के वास्ते।"
दामोदर स्वरूप 'विद्रोही'  का जन्म 2 अक्टूबर 1928 को शाहजहाँपुर जनपद की पुवायाँ तहसील के ग्राम मुड़िया पवार में मुरारीलाल गुप्त के घर हुआ। बचपन में ही माँ का साया सर से उठ गया , उधर अंग्रेज़ों के खिलाफ बगावत की चल रही हवा के चलते उनके पिता को भी भूमिगत होना पड़ा । ऐसे में अपने जीवन की राह उन्होंने भी क्रान्ति की दिशा में ही मोड़ ली ।अपना उपनाम विद्रोही रखने के साथ ही उन्होंने जनजागरण की कवितायें सुनानी शुरू कर दी । परेशानियों से जूझने के बावजूद उन्होंने शिक्षा ग्रहण करना जारी रखा ।एम.ए. की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने नौकरी करनी शुरू की , पर समझौता उनके लिए सहज नहीं था , परिणामस्वरूप त्यागपत्र देना ही उन्हें ठीक लगा । नौकरी को ठोकर मारने के बाद उनका लेखकीय सफ़र और भी ज्यादा प्रभावी होता चला गया । एक लम्बे समय तक मंच पर वीर रस के प्रतिष्ठित कवि के रूप में उन्हें जाना गया ।हालांकि उनके लिखे गीत ,ग़ज़ल,और मुक्तक भी अपनी छाप बखूबी छोड़ जाते थे । उनके द्वारा किये गए व्यवस्था और अत्याचार पर प्रहार कवि सम्मेलनो में तालियों की गडगडाहट बटोरने में सदा कामयाब रहे । "दिल्ली की गद्दी सावधान" नामक अपनी रचना से पूरे देश में चर्चित हुए विद्रोही जी निजी जीवन में भी गलत को गलत कहने का साहस दिखाते रहे ।उनके इस गुण को गीतकार अजय गुप्त ने अपने शब्दों में संजोते हुए कहा था कि  "गर चापलूस होते तो पुरखुलूस होते, चलते न यूँ अकेले पूरे जुलूस होते।"
राष्ट्र के लिए अदभुत अनुराग उनकी विशेषता थी । वो समय के साथ निष्ठाएं बदलने के सख्त खिलाफ थे । उनकी कविताओं में भी यह बखूबी नज़र आती है ।
"बहक जाये हवा के साथ ही जब राष्ट्र का चिंतन,
जहाँ का बुद्धिजीवी स्वार्थ-सुविधा में भटकता हो।
तो ऐसा व्यक्ति कवि चिंतक मनीषी हो नहीं सकता,
कि जिसका शब्द दुविधा की सलीबों पर लटकता हो।"
उनकी प्रमुख रचनाओं में दिल्ली की गद्दी सावधान (आग्नेय कवितायें),गुलाम शैशव (प्रारम्भिक काल की कवितायें),मेरे श्रद्धेय (महापुरुषों पर कवितायें),समय के दस्तावेज (इतिहासपरक रचनायें),हार हमारी जीत तुम्हारी (गीत संग्राह),त्रिधारा (गजल, मुक्तक व छन्द),कसक (करुण काव्य), दीवार के साये में (आत्मकथा) से उनके रचना संसार की व्यापकता का अंदाजा होता है। आदर्श श्रीवास्तव ने दामोदर स्वरूप विद्रोही : व्यक्तित्व एवं कृतित्व (वीर रस, राष्ट्रीयता तथा मंच के विशेष संदर्भ में) विषय पर  डॉ॰ एम० आर० खान आफरीदी के निर्देशन में पी०एचडी० की उपाधि प्राप्त की। विद्रोही जी को साहित्य भूषण, (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ)निराला पुरस्कार, (रायसेन-मध्य प्रदेश),सुमन पुरस्कार, (उन्नाव), भगवती चरण वर्मा पुरस्कार, (सफीपुर उत्तर प्रदेश),राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन जन्मशती सम्मान, राष्ट्र्भाषा हिन्दी प्रचार समिति(मुरादाबाद),शान्ति कुंज रामाश्रम का राजहंस सम्मान,और जनपद रत्न,( अटल बिहारी वाजपेयी जन्म-दिवस समारोह समिति, शाहजहाँपुर) सहित सैकड़ों पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। लेकिन इन सम्मानों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उनके चाहने वालों का वह सम्मान है जो वो अपने प्रिय कवि से करते आये हैं , और आगे भी करते रहेंगे । 11 मई 2008 को वो हम सबको छोड़ कर चले गए । उनकी कमी तो पूरी नहीं हो सकती , परन्तु उनका समर्द्ध रचना संसार हम सबके लिए अनमोल धरोहर है ।   उनके बेटे विवेक गुप्ता ने उनकी याद में विद्रोही स्मृति न्यास के तत्वाधान में प्रति वर्ष दो अक्टूबर को शाहजहाँपुर के गान्धी भवन में समारोह करके रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय से एम०ए० (हिन्दी) में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी अथवा अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन करके किसी एक कवि को विद्रोही स्मृति सम्मान दे रहे हैं ।इससे हम सबके बीच विद्रोही जी की मौजूदगी को जीवंतता मिल गई है। उनकी रचना देखिये ......

कुछ लोग जी रहे हैं यूँ आचरण बदलकर, शैतान पुज रहे हैं ज्यों आवरण बदलकर! 
कोई न अन्यथा ले मेरा सहज समर्पण, रख दूँगा एक पल में वातावरण बदलकर!
ऐसे भी हैं यहाँ कवि लिखकर के एक कविता, वर्षों सुना रहे हैं कुछ उद्धरण बदलकर!
अब इनको क्या कहूँ मैं जनता 'जनार्दन' है, संध्या उठा के लाये नव जागरण बदलकर! 
गीतों के पद ढले हैं संगीत के सुरों में, पाणिनि का श्राद्ध होता है व्याकरण बदलकर! 
भगवान मौत देना सम्मान वह न देना, स्वीकारना पड़े जो अन्त:करण बदलकर!