अक्सर हम सभी सोशल मीडिया पर बुराई की शिकायत करते हैं । हालांकि असल ज़िन्दगी में भी तमामतर स्वभाव वाले लोग मौजूद हैं । लेकिन हमारी उनसे एक साथ मुलाक़ात नहीं होती । असल ज़िन्दगी में हम अपने जैसे कुछ चुनिन्दा मित्रों के साथ , अपने ही पसंदीदा विषय पर बात करते हैं । अपनी विचारधारा और सोच के चश्में से अलग हट कर ना ही बोलना चाहते हैं , और ना ही सुनना चाहते हैं । असल ज़िन्दगी के उलट आभासी दुनिया सभी विषयों , मतों , विचारों पर सबको एक साथ अभिव्यक्ति की छूट देती है । जिसमें से कुछ सही होता है , तो कुछ गलत भी होता है । चौराहे की गप्पबाजियां संवेदनशील मुद्दों पर भी अपने चिर परिचित अंदाज़ में चाशनी लगा कर मौजूद रहती हैं । उनमे शायद यह समझने की कुव्वत नहीं रहती कि उनकी यह बात एक बड़े मंच पर बहुत तेज़ी से अपना दुष्प्रभाव छोड़ने जा रही है । दो-चार लोगों में ही सिमट कर ख़त्म होने लायक बात एक बड़े तबके तक पहुँच जाती है । तत्पश्चात यह आभासी दुनिया पूरी वास्तविकता के साथ मुक्का लात की सहूलियत देती है । इसमें यकीनन इस आभासी दुनिया का दोष नहीं है । यह उन तमाम लोगों की गलती है जो अपने वास्तविक जीवन में भी गलत ही बयान करते आये हैं । यह शायद हमारे असल समाज का सामूहिक प्रतिबिम्ब ही है, जिसकी भर्त्सना हम चाहे जैसे करें , लेकिन इस बड़ी तस्वीर के एक कोने में एक छोटा सा अक्स हमारा भी है ।

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