अब कोई जोधा अकबर के साथ
नहीं जायेगी , यह किसी फिल्म का डायलाग नहीं है । बल्कि इस तरह के ज़हरीले राजनीतिक
बयानों के बाद उत्तर प्रदेश सहित पूरे भारत में धार्मिक धुर्वीकरण के प्रयास तेज़
हो गए । उप-चुनाव सहित हरियाणा और महाराष्ट्र के संभावित चुनावों के मद्देनज़र राजनीति
में धार्मिक तड़का लगाने की इस कोशिश को उपचुनावों में तो
अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी । लेकिन इस कहानी पर रोज़ नए प्रयोग जारी हैं । “लव जिहाद” का मामला सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ प्रचार का ही मामला नहीं है, असल में पूरे समाज में
औरत-विरोधी सामन्ती सोच को बढ़ावा देने का भी मामला है। इसलिए “लव जिहाद” के मामले पर वे शक्तियाँ
एक ही जगह आ खड़ी हुई हैं ।जो औरतों के द्वारा अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने के मौलिक
अधिकार को किसी सूरत में न मानने पर तुले हुए हैं। ‘लव जिहाद’ नामक बेसिर-पैर के शब्द को गढ़ कर एक समुदाय के लोगों के दिल में दूसरे समुदाय के लोगों के प्रति नफरत बिठाने की कोशिश की जा रही है। समाज को धर्म के नाम पर बांटने के इस मिशन में सांप्रदायिक शक्तियों द्वारा झूठ-फरेब और मक्कारी का भी सहारा लिया जा रहा है। हक़ीक़त
में क्या इस तरह के 'लव जिहाद' और 'प्रेम युद्ध' का कोई अस्तित्व भी है?
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